उत्तर व्यवहारवाद

उत्तर व्यवहारवाद (post behaviouralism)


                 CONTENT

  1. परिचय
  2. अर्थ
  3. उत्तर व्यवहारवाद के उदय के कारण
  4. उत्तर व्यवहारवाद के लक्षण (FEATURES)
  5. निष्कर्ष

1) परिचय – 1960 के दशक की समाप्ति से पहले डेविड ईस्टन के द्वारा व्यवहारवादी स्थिति पर एक प्रबल आक्रमण किया गया, जो स्वयं व्यवहारवादी क्रांति के प्रमुख प्रतिपादकों में से था। व्यवहारवादी जिन्होंने अब उत्तर व्यवहारवादियों का रूप ले लिया था, यह मानते हैं कि उनके द्वारा नगण्य और प्रायः निरर्थक शोध पर बहुत अधिक समय खर्च कर दिया गया था। जबकि वे वैचारिक संरचनाओं, प्रतिमानों सिद्धांतों और अधिसिद्धांतों के निर्माण में लगे हुए थे। परमाणु शस्त्रों का आतंक, ग्रह युद्ध, तानाशाही शासनों के उदय की प्रवृत्ति, बढ़ते हुए सामाजिक मतभेद आदि ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो रही थी, जिनके संबंध में व्यवहारवादी राजनीतिशास्त्रियों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उत्तर व्यवहारवादिओ का प्रश्न था कि उस शोध अनुसंधान की उपयोगिता क्या थी, जिसने समाज और राज्य व्यवस्था के इन तीव्र रोगों, संकटों एवं समस्याओं के निदान की ओर ध्यान ही नहीं दिया था?

2) अर्थ – व्यवहारवादी राजनीतिक विश्लेषण में ‘प्रामाणिक अध्ययन’ के दौर में प्रमाणिकता में अंतर्निहित एवं प्रमाणिकता को प्रभावित करने वाले आधारभूत तथ्य ‘मूल्य’ के अध्ययन को उचित स्थान नहीं दिया गया। विश्लेषण की तकनीक को विश्लेषण वस्तु (लक्ष्य) से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक विश्लेषण को तथाकथित वैज्ञानिकता का एक निश्चित स्तर तो प्राप्त हो गया, लेकिन उसके निष्कर्षों में प्रासंगिकता एवं शाश्वतता का अभाव बना रहा। उत्तर व्यवहारवादी राजनीतिक विश्लेषण में मूल्यों को समाविष्ट कर राजनीतिक अध्ययन को प्रासंगिकता प्रदान करने के समर्थक हैं। उत्तर व्यवहारवाद अपने विश्लेषण में वैज्ञानिकता के तत्व को कमजोर नहीं करना चाहता, बल्कि वह वैज्ञानिकता के परिपेक्ष्य को ज्यादा विस्तृत करना चाहता है। इस अर्थ में उत्तर व्यवहारवाद को एक प्रकार की वैचारिक क्रांति कहा जा सकता है, क्योंकि यह राजनीतिक प्रक्रिया के अध्ययन के नवीन समन्वयात्मक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है, जिसमें तथ्य(fact) एवं मूल्य(value) दोनों का विवेकसम्मत समावेश किया गया है।

डेविड ईस्टन के शब्दों में ‘उत्तर व्यवहारवादी क्रांति उस व्यवहारवाद का घोर विरोध करती है, जिसके द्वारा राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान की कठोर वैज्ञानिक शोध पद्धति का प्रयोग कर परिशुद्ध विज्ञान का रूप देने का प्रयास किया गया है।’

3) उत्तर व्यवहारवाद के उदय के कारण – उत्तर व्यवहारवादी क्रांति का जन्म व्यवहारवादी रूढ़िवादिता और दिशा हीनता के कारण हुआ। डेविड ईस्टन ने सन् 1969 में अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन के अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि “व्यवहारवादी क्रांति से हम अपनी विश्लेषण को सार्थकता नहीं दे सकते हैं, अतः हमें उत्तर व्यवहारवादी बनना होगा।” उत्तर व्यवहारवादी क्रांति के उदय के निम्नलिखित कारण हैं –

1. यह व्यवहारवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद व्यवहारवादी प्रयासों के माध्यम से राजनीति विज्ञान को विश्वसनीय, सैद्धांतिक एवं वैज्ञानिक स्वरूप देने के प्रयास किए गए, लेकिन इसके बावजूद स्वयं कई व्यवहारवादी भी इन प्रयासों को अपर्याप्त एवं अपूर्ण अनुभव करने लगे।

2. ऐसा माना गया कि सामाजिक विज्ञानों की अध्ययन पद्धतियों को प्राकृतिक विज्ञानों की तरह लागू करना घातक है, क्योंकि समाज एवं व्यक्ति की प्रकृति परिवर्तनशील होती है, अतः उनका अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की तरह संभव नहीं है।

3. उत्तर व्यवहारवाद एक तरह से व्यवहारवादी शोध के प्रति असंतोष का परिणाम है। व्यवहारवाद में मूल्यों के अध्ययन को वैज्ञानिकता की दुर्बलता माना गया है तथा तथ्य प्रधान अध्ययन को विज्ञान का पर्याय माना गया है, क्योंकि तथ्य प्रधान अध्ययन वस्तुस्थिति का ‘यथार्थ’ अध्ययन है, मूल्य प्रधान अध्ययन की तरह आदर्श स्थिति का नहीं। लेकिन उत्तर व्यवहारवादिओ का मानना है कि तथ्य और मूल्य दोनों ही व्यक्ति के संदर्भ में प्रासंगिक हैं, अतः इन दोनों में भेद करना कृत्रिम है। राजनीति विज्ञान को सही अर्थों में राजनीतिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही रूपों में जीवन्त होना चाहिए, इसलिए मूल्यों को नकारा नहीं जाना चाहिए।

4) उत्तर व्यवहारवाद के लक्षण / विशेषता  – डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद के दो प्रमुख लक्षण बताए हैं- शोध की सार्थकता या प्रासंगिकता(relevance) और क्रिया अनिश्चितता या कर्म(action)। डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद की सात मान्यताओं या विशेषताओं का उल्लेख निम्न प्रकार से किया है जिन्हें वह प्रासंगिकता के सिद्धांत कह कर पुकारते हैं :

1. तकनीक से पूर्व सार – उत्तर व्यवहारवादियों का कहना है कि व्यवहारवादी तकनीक को तथ्यों (सार या विषयवस्तु) के ऊपर प्रधानता देते हैं। उत्तर व्यवहारवादी यह मानते हैं कि प्रायः तथ्य और तकनीक दोनों का साथ साथ उचित प्रयोग किया जाना चाहिए और ऐसा संभव भी है। तथ्यों की बलि चढ़ाकर व्यवहारवादी प्रायः तकनीक के पीछे भागते रहे हैं जबकि उत्तर व्यवहारवादी कहते हैं कि अनुसंधान के लिए परिष्कृत उपकरणों का विकास करना उपयोगी है परंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात वह उद्देश्य है जिसके लिए इन उपकरणों का प्रयोग में लाया जा रहा है।

2. सामाजिक परिवर्तन पर बल – व्यवहारवाद में मामूली परिवर्तन और से संबंधित रूढ़िवादी विचारधारा छिपी हुई है। उत्तर व्यवहारवाद व्यापक मूल्यों के संदर्भ में परिवर्तन का समर्थन करता है।

उत्तर व्यवहारवादियों का मानना है कि जाने अनजाने व्यवहारवादी परिवर्तन विरोधी रूढीवादी हो जाते हैं। परिवर्तन विरोधी व्यवहारवाद के प्रणालीशास्त्र और तकनीक में निहित है। व्यवहारवादी तथ्यों के वर्णन और विश्लेषण तक अपने को सीमित रखता है। उन तथ्यों के व्यापक संदर्भों को, उनकी सामाजिक प्रासंगिकता को समझने की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देता। अतः वह व्यापक संदर्भ की ओर से उदासीन ही रहता है। इन सब का परिणाम यह हुआ कि व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान ने एक ऐसी सामाजिक रूढ़िवादिता की विचारधारा का रूप ले लिया था, जिसमें केवल धीमी गति से होने वाले परिवर्तनों के लिए ही गुंजाइश थी।

3. समस्याओं के विश्वसनीय निदान की आवश्यकता – उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार राजनीति विज्ञान को अमूर्ति,करण विश्लेषण, विशिष्ट शब्दावली के विकास आदि में कम रुचि लेकर मानव जाति की आवश्यकताओं को पूरा तथा संकटों का समाधान करने में सहायता करनी चाहिए। व्यवहारवादी युग में राजनीति विज्ञान ने राजनीति की क्रूर यथार्थताओं से अपना नाता बिल्कुल ही तोड़ लिया था।

यह युग संकट और चिंता का युग था और व्यवहारवाद के अमूर्त प्रत्ययों एवं अवधारणाओं में व्यक्ति तथा समाज की व्यापक एवं गंभीर समस्याओं के समाधान की क्षमता नहीं थी। राजनीतिशास्त्र का औचित्य उसी स्थिति में सर्वमान्य होगा, जबकि समाज में व्याप्त विषमताओं, संघर्षों आकांक्षाओं, संदर्भों एवं चिंताओं के उचित समाधान किए जायें। इसलिए व्यवहारवाद पर यह आक्षेप है कि उसकी शोध वस्तुस्थिति से असंबंधित होती है। उत्तर व्यवहारवाद का मूल उद्देश्य राजनीति शास्त्र की मदद करना है, ताकि इस संकट से बचा जा सके, जिससे मानव जाति की वास्तविक आवश्यकता को पूरा किया जा सके।

4. मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका – उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार कोई भी ज्ञान विशेषकर सामाजिक विज्ञान मूल्यात्मक दृष्टि से न तो तथ्यों एवं प्रासंगिक यथार्थताओं से तटस्थ रहा है और न ही रह सकता है। अतः व्यवहारवादियों को चाहिए कि अपने ज्ञान की सीमाएं पहचानने के लिए उन आधारभूत मूल्यों को पहचाने जिन पर वह ज्ञान टिका है।

व्यवहारवादियो ने मूल्यों के महत्व को सर्वथा अस्वीकार न करते हुए भी विज्ञानवाद और मूल्य निरपेक्ष दृष्टिकोण पर इतना अधिक जोर दिया था कि व्यावहारिक दृष्टि से मूल्यों को सर्वथा उपेक्षा योग्य मान लिया गया था। इस स्थिति ने राजनीति विज्ञान को नीरस तथा प्रयोजनहीन बना दिया। वस्तुतः मूल्यों की आधारशिला पर ही ज्ञान की इमारत खड़ी की जा सकती थी। अतः उत्तर व्यवहारवादियो ने मूल्यों की निर्णायक भूमिका को स्वीकार किया है।

5. बुद्धिजीवियों की भूमिका – उत्तर व्यवहारवादियों ने राजनीतिशास्त्रियों को यह भी याद दिलाना चाहा है कि बुद्धिजीवी होने के नाते समाज में उनकी अपनी एक भूमिका है। राजनीति वैज्ञानिक बुद्धिजीवी होने के नाते यदि मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है तो वह अपने उचित भूमिका नहीं निभाता वरन् अपने दायित्व से विमुख हो जाता है। सभ्यता के मानवीय मूल्यों के संरक्षण में अधिक से अधिक प्रयत्नशील होना उनका प्रमुख उत्तरदायित्व था।

6. कर्मनिष्ठ विज्ञान – उत्तर व्यवहारवादी कर्मनिष्ठता पर बल देते हैं और उनका कथन है कि राजनीतिक विषयों के अध्ययनकर्ता को समाज के पुनर्निर्माण कार्य में रत होना चाहिए। उनका मत है कि ज्ञान व्यवहारिक रूप से सार्थक होना चाहिए। उत्तर व्यवहारवादियों की मांग है कि कोरे चिंतन की ओर उन्मुख ज्ञान के स्थान पर प्रत्येक शोधकर्ता को ऐसा शोध करना चाहिए जिसका समसामयिक समस्याओं को सुलझाने में योगदान हो।

7. व्यवसाय का राजनीतिकरण – राज्यवैज्ञानिक तटस्थ रहने में गर्व अनुभव करते हैं। वे समाज की राजनैतिक गर्मा-गर्मियों में स्वयं को शामिल करके सक्रिय भूमिका अदा करने में विश्वास नहीं रखते। जबकि उत्तर व्यवहारवाद की मान्यता है कि राजनीतिशास्त्रियों को समाज में सकारात्मक भूमिका अदा करनी चाहिए जिससे समाज के उद्देश्यों को एक सुव्यवस्थित दिशा प्रदान की जा सके। अतः बुद्धिजीवियों के संघों और समुदायों, यहां तक कि विश्वविद्यालयों को भी मानव मूल्यों की रक्षा हेतु संघर्ष के मैदान में आ जाना चाहिए। उनके व्यवसाय का राजनीतिकरण अपरिहार्य एवं वांछनीय है।

निष्कर्ष – सार रूप में यह कहा जा सकता है कि उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवाद की कमियों को दूर करने का प्रयास है और साथ ही इसमें बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने ज्ञान के माध्यम से समाज में सुधार करने का प्रयास करेंगे। उत्तर व्यवहारवादी चाहते हैं कि राजनीतिक वैज्ञानिकों द्वारा अपने ज्ञान की छाप अपने युग के सामाजिक प्रश्नों और समस्याओं पर अंकित किया जाना अनिवार्य उत्तरदायित्व है।

वर्तमान समय (1970 ई. के बाद) में व्यवहारवादियों तथा उत्तर व्यवहारवादियों के बीच पारस्परिक विरोध की स्थिति समाप्त हो गई है। व्यवहारवाद की इस बात को स्वीकार कर लिया गया है कि राजनीति विज्ञान में अधिकाधिक मात्रा में अनुभाविक अध्ययन और परिशुद्ध परिणाम देने वाली पद्धतियों को अपनाते हुए इसे सही अर्थों में विज्ञान की स्थिति प्रदान करने की चेष्टा की जानी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी मान लिया गया है कि राजनीति का ज्ञान वास्तविक राजनीतिक जीवन की समस्याओं और जटिलताओं से अलग रहकर नहीं किया जा सकता तथा समस्त राजनीतिक अध्ययन में मूल्यों को केंद्रीय स्थिति प्राप्त होनी चाहिए।

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