उदारवाद (Liberalism)

 

परंपरागत उदारवाद ( classical liberalism)

उदारवाद का यह रूप 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड में उभर कर सामने आया। यह व्यक्ति के अधिकारों की संवैधानिक मांग तक सीमित था। इस दृष्टिकोण के अनुसार राज्य का निर्माण सब व्यक्तियों ने मिलकर सब के व्यक्तिगत लाभ के उद्देश्य से किया है। अतः ‘राज्य एक साधन है जबकि व्यक्ति उसका साध्य है।’ इस दृष्टिकोण के अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई है। राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती करता है, इसलिए वह एक बुराई है , परंतु यदि राज्य ना हो तो लोग एक दूसरों को सताने लगेंगे, धोखा देंगे और जीवन एवं संपत्ति की कोई सुरक्षा नहीं रह जाएगी। इस दृष्टिकोण से राज्य उपयोगी है।

लांक के विचार:  लांक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “two treaties of civil government- 1669” में राज्य की दैवीय उत्पत्ति के सिद्धांत (divine origin theory of kingship) का खंडन किया है जिसे सर रॉबर्ट फिल्मर ने प्रस्तुत किया था और तर्क दिया कि राज्य सत्ता का स्वरूप एक न्यास या धरोहर के तुल्य है। सरकार ऐसा संगठन है जिसे कोई समुदाय अपनी पसंद से चुनता है, अतः सरकार स्वयं समुदाय के प्रति निष्ठा से बंधी होती है। समुदाय एक ऐसी ग्रह स्वामी है जो घर की रखवाली के लिए पहरेदार रखता है, फिर वह स्वयं जागकर यह देखता है कि कहीं वह पहरेदार सो तो नहीं गया है।लांक के अनुसार , राजनीतिक सत्ता का स्त्रोत नागरिक समाज है और नागरिक समाज विवेकशील लोगों का समूह है क्योंकि वह अपने हित को अच्छी तरह समझते हैं। अतः उन्हें स्वतंत्र रहने दिया जाए तो वह अपना हित साधन करने में समर्थ होंगे। मनुष्य को सामाजिक जीवन में बांधने के लिए यह जरूरी नहीं कि कोई प्रभुसत्ताधारी उन पर अपना नियम लागू करे। इस तरह उसने राज्य के पैतृकतावादी आधार (paternalistic basis) का खंडन किया है, जिसके अंतर्गत यह स्वीकार किया जाता था कि व्यक्ति अपने हित साधन में असमर्थ है, अतः उसे प्रभु सत्ताधारी के निर्देशों के अनुसार रहना चाहिए। इसके विपरीत लॉक ने स्वयं प्रभचसत्ताधारी को समुदाय का सेवक बना दिया है।

एडम स्मिथ के विचार:  अर्थशास्त्र के जनक के रूप में प्रसिद्ध एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘wealth of nations-1776’ में हस्तक्षेप की नीति और व्यक्तिवाद का समर्थन किया। उसका मानना था कि मानव में व्यापार करने की सहज भावना होती है, ताकि वह अधिक से अधिक धन कमा सके। उद्यमी व्यक्ति की स्वार्थ भावना मानहित को प्रोत्साहित करती है, जिससे व्यापारी वर्ग , सरकार और कामगार सभी को फायदा होगा। जिससे देश समृद्ध हो सकेगा। स्मिथ ने उद्योग और व्यापार की स्वतंत्रता को प्राकृतिक स्वतंत्रता मानते हुए राष्ट्रीय समृद्धि के लिए इसे अनिवार्य माना है। उसका मानना है कि व्यापारी वर्ग सरकार से बेहतर रूप से अपने हितों को जानता है, अतः सरकार को इन के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। इस प्रकार सरकार के केवल तीन ही कार्य बच जाते हैं- बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना, न्याय का प्रवर्तन और सार्वजनिक निर्माण के ऐसे कार्य करना जिन्हें करने के लिए निजी उद्यमी तैयार न हो।

जेरेमी बेंथम के विचार:  उपयोगितावादी बेंथम ने अपनी पुस्तक ‘an introduction to the principles of morals and legislation’ में सार्वजनिक नीति की कसौटी का आधार ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ (greatest happiness of the greatest number) बताया है। बेंथम ने प्राचीन यूनानी दार्शनिक एपीक्यूरस के ‘सुखवाद’ (hedonism) की धारणा का समर्थन करते हुए कहा हैं मनुष्य सदैव सुख को पाना चाहता है और दुख से बचना चाहता है। जो बात सुख को बढ़ाती है और दुख को कम करती है, उसे ‘उपयोगिता’ कहा जाता है। बेंथम का यह भी मानना है कि सुख और दुख कोई कल्पना मानदंड नहीं है बल्कि बाकायदा नाप-तौल के विषय हैं। बेंथम ने भिन्न भिन्न प्रकार के सुखों में गुणात्मक अंतर का खंडन करते हुए केवल मात्रा के अंतर को स्वीकार किया है। बेंथम के अनुसार विधि निर्माण का आधार भी ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए और अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख की गणना करते समय हर एक व्यक्ति को एक इकाई मानना चाहिए , किसी को एक से अधिक नहीं। इस प्रकार बेंथम ने मनुष्यों की समानता पर बल दिया है। बेंथम का यह भी कहना है कि चूंकि हर व्यक्ति अपने हित का सर्वोत्तम निर्णायक है इसलिए सरकार का मुख्य कार्य ऐसे कानून बनाना है, जो लोगों की स्वतंत्र गतिविधियों के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करे। साथ ही सामान्य हित को ध्यान में रखते हुए लोगों पर उचित प्रतिबंध लगाना और अपराधियों को दंड देना भी सरकार का कार्य है इस तरह बेंथम ‘अहस्तक्षेप की नीति’ और ‘व्यक्तिवाद’ का समर्थक है।

हर्बर्ट स्पेंसर के विचार: स्पेंसर ने न्यूनतम शासन(minimum government) के सिद्धांत का समर्थन करते हुए राज्य की उत्पत्ति तो समझौते से मानी है परंतु समाज की धारणा सजीव प्राणी के रूप में की है। स्पेंसर का कहना है कि समाज रूपी जीवों के जो अंग सुचारू रूप से कार्य ना करें, उनके नष्ट हो जाने में ही समाज की भलाई है।
चार्ल्स डार्विन के सूत्र ‘जीवन संघर्ष में योग्यतम की विजय’ (survival of the fittest) को आधार बनाकर स्पेंसर ने यह निष्कर्ष निकाला कि समाज की ओर से दीन दुखियों की सहायता के प्रयत्न सामाजिक विकास में बाधक होते हैं, इसलिए ऐसे प्रयत्न निंदनीय हैं। स्पेंसर के अनुसार प्रगति का अर्थ यह है कि जीवन संघर्ष में जो लोग बिछड़ जाएं उन्हें मर- खप जाने दिया जाए।

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