उदारवाद (Liberalism)

 

आधुनिक उदारवाद ( modern liberalism)

 

19 वी शताब्दी के आरंभ में ही उदारवाद की नकारात्मक संकल्पना में परिवर्तन आया , जिसमें यह माना गया कि ‘प्रतिबंधों का अभाव’ ही स्वतंत्रता नहीं है, अतः समाज के चौतरफा विकास के लिए राज्य को अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वाह करना होगा क्योंकि अब नगरों उद्योग धंधो और वाणिज्य व्यापार के राष्ट्रव्यापी और विश्वव्यापी विस्तार के फलस्वरूप भी उदारवाद में परिवर्तन आया।

इसके साथ ही पण्य वस्तुओं के स्वतंत्र व्यापार के भयानक परिणाम भी सामने आये थे। कच्ची उम्र के बच्चों को कारखानों में भयानक परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। साथ ही मजदूरों को गंदी बस्तियों में रहना पड़ता था और मांस तथा गंदी शराब खुलेआम बाजारों में बिकती थी। इन परिस्थितियों में सर्वहित के उद्देश्य से बाजार का विनियमन आवश्यक हो गया।

उपयोगितावाद में संशोधन: बेंथम के उपयोगितावाद में परिवर्तन करते हुए मिल कहता है कि भिन्न-भिन्न सुखों में केवल परिमाण का अंतर नहीं होता गुड़ का अंतर भी होता है। मनुष्य केवल भौतिक सुखों के पीछे नहीं दौड़ता बल्कि उसकी नैतिक बौद्धिक और कलात्मक अभिरुचियों का विकास भी जरूरी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता , क्योंकि एक व्यक्ति की बात भी सारे समाज से अलग हो , तो भी उसे चुप कराने का कोई अधिकार नहीं है।

स्वतंत्रता संपत्ति और विनियमन के अंतर्गत मिल ‘आत्म परक’ और ‘अन्य परक’ की बात करता है और कहता है कि अन्य परक गतिविधियों का संबंध दूसरों से है अतः राज इसका ध्यान रखते हुए नियम बनाये। आर्थिक नियम बनाते समय संपत्ति के अधिकार को सीमित करने की वकालत की। उसने भू-संपत्ति के अधिकार पर विशेष रूप से प्रहार किया। मिल का मानना है कि अतिरिक्त आय पर कर लगाकर उसका उपयोग श्रमिकों के कल्याण के लिए ही करना चाहिए।

आत्मपरक कार्य: जिनका सरोकार स्वयं करने वाले से होता है- दूसरों पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
अन्यपरक कार्य: जिनका समाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मिल ने तर्क दिया है कि व्यक्ति के आत्मपरक कार्यों में राज्य की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और उसके अन्यपरक कार्यों में केवल उन्ही कार्यों पर रोक लगाई जानी चाहिए जो दूसरों को हानि पहुंचाते हो और यह बात प्रमाणित की जा सकती हो।

 

टी. एच. ग्रीन के विचार:ग्रीन, कांट और हीगल के विचारों के आधार पर उदारवाद के विचार को कल्याणकारी राज्य की दिशा में आगे बढ़ाया।

ग्रीन के अनुसार नैतिक स्वतंत्रता मनुष्य का उपयुक्त गुण है और सच्ची स्वतंत्रता अधिकारों की मांग करती है अधिकार मनुष्यों के नैतिक चरित्र से जन्म लेते हैं किसी अनुभवातीत कानून से नहीं। क्योंकि मनुष्य एक नैतिक प्राणी है इसलिए सब मनुष्यों के आदर्श उद्देश्य एक जैसे होते हैं अतः अधिकारों में द्वंद नहीं होता है।

अधिकारों की प्रकृति: ग्रीन राज्य और समाज में अंतर करता है और कहता है कि अधिकार समाज की मान्यताओं पर आश्रित होते हैं न कि राज्य या कानून पर। राज्य अधिकारों को मान्यता देता है उनका श्रजन नहीं करता। राज्य का वास्तविक कार्य बाधा को दूर करना है जो मनुष्य के आदर्श उद्देश्यों के मार्ग में आती है।

संपत्ति संबंधी विचार: ग्रीन संपत्ति के अधिकार का भी समर्थन करता है क्योंकि संपत्ति सामाजिक हित को बढ़ावा देती है। परंतु वह भूमि के स्वामित्व का विरोध करता है।

 

लांस्की के विचार:   लास्की ने लिखा है कि पूंजीपतियों की शक्ति को समुदाय के हित में संयत करना जरूरी हो गया है अन्यथा पूंजीवादी व्यवस्था मानवता के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी। लास्की ने समाजवाद के भेद और लोकतंत्र की प्रणाली को एक साथ मिलाने का समर्थन किया और राज्य के कल्याणकारी कार्यों को विशेष महत्व दिया। लोगों द्वारा संपत्ति अर्जित करने पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए परंतु संपन्न वर्गों पर भारी कर लगाकर आर्थिक विषमताओं (economic inequalities) को कम किया जाना चाहिए।

लास्की ने पूंजीवादी राज्य को नया रूप देने के लिए आर्थिक शक्ति के लोकतंत्रीकरण का सुझाव दिया। इस कार्य के लिए उत्पादन और वितरण के प्रमुख साधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण को बढ़ाना, प्रगतिशील कार्य प्रणाली द्वारा आर्थिक विषमताओं को कम करना होगा, और ऐसा लोकतंत्र राज्य स्थापित करना होगा जो नागरिकों के कल्याण से अपना वास्ता रखता हो। इस प्रकार लास्की ने उदारवाद और कल्याणकारी राज्य के मणिकांचन सहयोग को बढ़ावा दिया है। उसने अनुभव किया कि यदिचरम पूंजीवाद के दौर में कल्याणकारी राज्य को बढ़ावा नहीं दिया गया तो पूंजीवाद धराशाई हो जाएगा। लास्की को डर था कि पूंजीवाद के ह्वास के साथ उदारवादी राज्य भी धराशाई हो जाएगा और उसके स्थान पर किसी तरह की तानाशाही स्थापित हो जाएगी , जिसमें मनुष्य की स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी।

 

मैकाइवर के विचार:   मैकाइवर ने अपनी पुस्तक the modern state के अंतर्गत आधुनिक राज्य की उत्पत्ति और विकास पर विचार करते हुए यह तर्क दिया कि आधुनिक राज्य का कार्य विभिन्न साहचर्यों (associations) के हितों में सामंजस्य स्थापित करना है। अपनी दूसरी पुस्तक ‘the webs of government’ (शासन तंत्र) के अंतर्गत मैकाइवर कहता है कि कला , साहित्य , धर्म आदि में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए तथा आर्थिक संबंधों को अपने आप समायोजित(adjust) होने देना चाहिए।

सेवा धर्मी राज्य ( service state) का समर्थन करते हुए मैकाइवर कहता है कि जब तक आधुनिक राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अटूट रहने दिया जाता है तब तक पूंजीवाद की बुराइयों से डरने की जरूरत नहीं है।

 

हाबहाउस के विचार:  इसने उदारवाद व समाजवाद के उस संयोग को बढ़ावा दिया जिसका सूत्रपात मिल के चिंतन से हुआ था। हाबहाउस के अनुसार राजनीति का लोकतंत्रीय आधार ही राज्य के कार्य क्षेत्र में विस्तार चाहता है। अतः वर्तमान समय में राज्य के नए कर्तव्यों का बोध जाग रहा है और उदारवाद इनकी उपेक्षा नहीं कर सकता।

हाबहाउस ने element of Social Justice में लिखा है कि “स्वतंत्रता की आधारशिला सामाजिक बंधन के आध्यात्मिक प्रकृति और सर्वहित का युक्ति युक्त स्वरूप है।” आदर्श वादियों की तरह वह यह भी स्वीकार करता है कि वैयक्तिक हित सर्वहित से जुड़ा हुआ है और सर्वहित का आधार वैयक्तिक हित होता है। राज्य एक साध्य का साधन है इसका साध्य है, ‘सद् जीवन का मार्ग प्रशस्त करना।’

हाबहाउस ने राज्य के दो कार्य बताए हैं:

1. ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिनमें मनुष्य का मन और चरित्र अपना विकास कर सकें। इसके लिए सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार और शासन तंत्र का उपयोग आवश्यक है।

2. ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिनमें राज्य के नागरिक अपने ही प्रयत्न से वह सब कुछ प्राप्त कर सके जो पूरी नागरिक कार्यकुशलता के लिए आवश्यक है। इसके लिए उपयुक्त कानून बनाने होंगे ताकि स्वार्थी तत्व व्यक्ति के अपने प्रयास में बाधा न डाल सके। दोनों तरह के कार्यों में राज्य के नियंत्रण का ध्येय स्वतंत्रता की क्षेत्र का विस्तार होना चाहिए, उसे संकुचित करना नहीं।

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