दैवीय सिद्धांत

 

 

दैवीय सिद्धांत (devine theory)

 

राज्य की उत्पत्ति के संबंध में प्रचलित यह सिद्धांत सबसे अधिक प्राचीन है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य मानवीय नहीं बल्कि ईश्वर द्वारा स्थापित संस्था है। ईश्वर यह कार्य या तो स्वयं ही करता है या इस संबंध में अपने किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति करता है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होने के नाते केवल उसी के प्रति उत्तरदाई होता है और राजा की आज्ञा का पालन प्रजा का परम पवित्र धार्मिक कर्तव्य है।

सिद्धांत के प्रमुख तत्व

1.- राज्य मानवी कृति नहीं वरन ईश्वरीय सृष्टि है।
2.- रांची शक्ति का प्रादुर्भाव ईश्वर द्वारा हुआ। ईश्वर ही राजाओं को शक्ति प्रदान करता है।
3.- जिस प्रकार ईश्वर का प्रत्येक कार्य अनिवार्य रूप से सृष्टि के हित में होता है उसी प्रकार राजा के सभी कार ठीक , न्यायसंगत और आवश्यक रूप से जनता के हित में होते हैं।
4.- राजसत्ता पैत्रक होती है अर्थात पिता के बाद पुत्र सत्ता का अधिकारी होता है।
5.- राजाओं की आलोचना और निंदा धर्म विरुद्ध है। इसी बात के आधार पर जेंम्स प्रथम ने कहा था कि “ईश्वर क्या करता है इस पर विवाद करना नास्तिकता तथा पाखंड है। इसी प्रकार प्रजा के हृदय में राजा के कार्यों के प्रति आलोचना का भाव होना अथवा उसके द्वारा यह कहा जाए कि राजा यह कर सकता है और यह नहीं कर सकता, राजा का अपमान, अनादर और तिरस्कार करना है।”

दैवीय सिद्धांत के समर्थक- विभिन्न धर्म ग्रंथों में राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत का समर्थन किया गया है। यहूदी धर्म की प्रसिद्ध पुस्तक ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ (old testament) में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है। सेंट अगस्टाइन और पोप ग्रेगरी द्वारा भी इस सिद्धांत का समर्थन किया गया है। आगे चलकर इसाई संतो ने यह भी कहा कि ” राजा के प्रति विद्रोह की भावना ही ईश्वर के प्रति विद्रोह है और जो ऐसा करेगा उसे मृत्यु मिलेगी।” इसी प्रकार महाभारत , मनुस्मृति आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में यह प्रतिपादन किया गया है कि राजा का निर्माण इंद्र , मित्र वरुण , यम आदि देवताओं के अंश को लेकर हुआ है और राजा मनुष्य के रूप में एक महत्वपूर्ण देवता होता है।

इस सिद्धांत का सबसे प्रबल समर्थन 17 वी सदी में स्टुअर्ट राजा जेम्स प्रथम द्वारा अपनी पुस्तक लॉ ऑफ मोनार्की (low of monarchy) में किया गया। उसका प्रसिद्ध वाक्य है “राजा लोग पृथ्वी पर ईश्वर की जीवित प्रतिमाएं हैं।” जेम्स प्रथम के बाद रोबर्ट फिल्मर और बूजे के द्वारा भी इस सिद्धांत का समर्थन किया गया।

सिद्धांत की आलोचना (criticism to theory ) –

राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धांत एक लंबे समय तक प्रचलित रहा किंतु आज के वैज्ञानिक और प्रगतिशील संसार में इसे अस्वीकार कर दिया गया है। वस्तुतः सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही आधार पर यह सिद्धांत त्रुटिपूर्ण है। इसकी प्रमुख रूप से निम्नलिखित आलोचनाएं की जाती हैं-

1.– अनैतिहासिक व अनैतिक – यह सिद्धांत और वैज्ञानिक ऐतिहासिक तथा मानवीय अनुभव के विरुद्ध है। वस्तुतः राज्य एक मानवी संस्था है तथा राज्य के कानूनों का निर्माण व उन्हें लागू करना मनुष्य का ही कार्य है। इतिहास में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, कि राज्य ईश्वरकृत है। गिलक्रास्ट के शब्दों में यह धारणा कि “परमात्मा इस या उस मनुष्य को राजा बनाता है अनुभव एवं साधारण ज्ञान के सर्वथा प्रतिकूल है।”

2.- राजा स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश हो जाएगा – राजा को ईश्वर की जीवित प्रतिमाएं मानने का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि राजा स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश हो जाएगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अपने आपको ईश्वर का अंश कहने वाले शासकों ने जनता पर अनेक अत्याचार किए और उन्हें ईश्वरी प्रकोप से डरा कर उन पर निरंकुशता का व्यवहार किया।

3.- अतार्किक – हमारे धार्मिक ग्रंथ यही बताते हैं कि ईश्वर प्रेम और विद्या का भंडार है लेकिन व्यवहार के अंतर्गत अनेक राजा बहुत अधिक अत्याचारी और दुष्ट प्रकृति की होते हैं। इन राजाओं को प्रेम और दया के भंडार ईश्वर का प्रतिनिधि कैसे कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में दैवीय सिद्धांत पूर्णतः अतार्किक हो जाता है। प्रारंभ में चर्च के पादरी यों का मत था कि ईश्वर द्वारा बुरे राजा को जनता को दंड देने के लिए भेजा जाता है परंतु जनता चाहे कितनी ही पापी क्यों ना हो नैतिकता के किसी भी सिद्धांत के अनुसार पूरे राजा ईश्वरीय नहीं हो सकते हैं।

4. रूढ़िवादी धारणा – दैवी सिद्धांत को स्वीकार करने का परिणाम यह होगा कि राज्य को पवित्र पावन संस्था समझकर उसके स्वरूप में आवश्यकतानुसार परिवर्तन नहीं किए जा सकेंगे। राज्य का अपरिवर्तित रूप मानव जीवन के लिए उपयोगी नहीं रहेगा।

5. नास्तिको के लिए निरर्थक – राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धांत ईश्वर में आस्था रखने वाले व्यक्तियों के लिए राजा की आज्ञा पालन का आधार बन सकता है , लेकिन नास्तिक व्यक्ति राजा की आज्ञा का पालन क्यों करें इसके लिए इस सिद्धांत में कोई आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।

6. वर्तमान परिस्थितियों में लागू नहीं होता – वर्तमान समय की प्रजातंत्रात्मक राज्यों में राज्य के प्रधान को जनता के द्वारा निर्वाचित किया जाता है, अतः इस सिद्धांत का प्रतिपादन कि राजा को ईश्वर नियुक्त करता है पूर्णतः अवास्तविक एवं काल्पनिक हो जाता है।

महत्त्व( importance)
यद्यपि आज दैवीय सिद्धांत को अस्वीकार किया जा चुका है लेकिन प्रारंभिक काल में जब मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक अंग को धर्म से संबंधित समझता था , यह सिद्धांत अत्यंत मूल्यवान सिद्ध हुआ। राज्य को देवी संस्था और राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बता कर इस सिद्धांत ने प्रारंभिक व्यक्ति को राज भक्ति एवं आज्ञा पालन का पाठ पढ़ाया। इस प्रकार इस सिद्धांत के द्वारा व्यवस्थित जीवन की नींव रखी गई। गिलक्रिस्ट ने कहा है कि यह सिद्धांत चाहे कितना ही गलत और विवेकशून्य क्यों न हो, अराजकता के अंत का श्रेय इसे अवश्य ही प्राप्त है।

इस सिद्धांत का इस दृष्टि से भी महत्व है कि यह राजनीतिक संस्था के नैतिक आधार पर जोर देता है। यह बात असत्य होते हुए भी इसमें इस बात की ध्वनि मिलती है किस शासक का ईश्वर के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व होता है और इसलिए शासन की शक्ति का उपयोग उचित रूप से किया जाना चाहिए।

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