भारतीय संविधान का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

भारतीय संविधान का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

                                    CONTENT

  1. 1973 का रेगुलेटिंग एक्ट
  2. 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट
  3. 1833 का चार्टर अधिनियम
  4. 1853 का चार्टर अधिनियम

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 ई. में व्यापार करने आयी। महारानी एलिजाबेथ प्रथम के चार्टर द्वारा उन्हें भारत में व्यापार करने के विस्तृत अधिकार प्राप्त थे। 18 सो 58 में सिपाही विद्रोह के परिणाम स्वरूप ब्रिटिश राज ने भारत के शासन का उत्तरदायित्व प्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लिया। यह शासन 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अनवरत रूप से जारी रहा।

स्वतंत्रता मिलने के साथ ही भारत में एक संविधान की आवश्यकता महसूस की गई। 1946 में एक संविधान सभा का गठन किया गया और लगभग तीन वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान अस्तित्व में आया। यद्यपि संविधान और राजव्यवस्था की अनेक विशेषताएं ब्रिटिश शासन से ग्रहण की गई थी तथापि ब्रिटिश शासन में कुछ घटनाएं ऐसी थी, जिनके कारण ब्रिटिश शासित भारत में सरकार और प्रशासन की अलग रूपरेखा निर्मित की गई। इन घटनाओं ने हमारे संविधान और राजतंत्र पर गहरा प्रभाव डाला। इन घटनाओं का विवरण इस प्रकार है –

कंपनी का शासन (1773 से 1858 तक )

1973 का रेगुलेटिंग एक्ट

इस अधिनियम का अत्यधिक संवैधानिक महत्व है। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला कदम था। इसके द्वारा पहली बार कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता मिली। इसके द्वारा भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गई।

अधिनियम की विशेषताएं

1. इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर को बंगाल का ‘गवर्नर जनरल’ पद नाम दिया गया एवं उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया। पहला गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंग्स था।

2. इस अधिनियम के माध्यम से मद्रास एवं मुंबई के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिए गए, जबकि पहले सभी प्रेसीडेंसीओं के गवर्नर एक दूसरे से अलग थे।

3. अधिनियम के अंतर्गत कोलकाता में 1774 में उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।

4. इसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और भारतीय लोगों से उपहार व रिश्वत लेना प्रतिबंध कर दिया गया।

5. इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश सरकार का कोर्ट आफ डायरेक्टर्स (कंपनी की गवर्निंग बॉडी) के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण सशक्त कर दिया गया। इसका कार्य राजस्व, नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना था |

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 की कमियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने एक संशोधित अधिनियम 1781 में पारित किया, जिसे ‘एक्ट आफ सेटेलमेंट’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद एक अन्य महत्वपूर्ण अधिनियम पिट्स इंडिया एक्ट 1784 में अस्तित्व में आया।

अधिनियम की विशेषताएं –

1. इसने कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्य को पृथक कर दिया।

2. इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षक की अनुमति तो दे दी, लेकिन राजनीति मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड आफ कंट्रोल) नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया/। इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था का शुभारंभ किया गया।

3. नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति प्रदान की गई कि वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक, सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षण एवं नियंत्रण कर सके।

हीरा अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था – पहला, भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश आधी पत्ती का क्षेत्र कहा गया। दूसरा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्य और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया।

1833 का चार्टर अधिनियम

ब्रिटिश भारत के केंद्रीकरण की दिशा में जा अधिनियम निर्णायक कदम था। इस अधिनियम की विशेषताएं निम्नलिखित थी –

अधिनियम की विशेषताएं

1. बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया, जिसमें सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित थी। इस प्रकार इस अधिनियम ने पहली बार एक ऐसी सरकार का निर्माण किया, जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण था। लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।

2. मद्रास और बंबई के गवर्नरोंको विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए। इसके अंतर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट अधिनियम कहा गया।

3. ईस्ट इंडिया कंपनी को एक व्यापारिक निकाय के रूप में की जाने वाली गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया। अब यह विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बन गया। इसके तहत कंपनी के अधिकार वाले क्षेत्र ब्रिटिश राजशाही और उसके उत्तर अधिकारियों के विश्वास के तहत ही कब्जे में रह गए।

4. चार्टर एक्ट 1833 ने सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू करने का प्रयास किया। इसमें कहा गया कि कंपनी में भारतीयों को किसी पद, कार्यालय और रोजगार को हासिल करने से वंचित नहीं किया जाएगा। हालांकि कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।

1853 का चार्टर अधिनियम

1793 में से 18 सो 53 के दौरान ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए चार्टर अधिनियम की श्रंखला में यह अंतिम अधिनियम था। संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम था।

अधिनियम की विशेषताएं

1. पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया। इसके तहत परिषद में 6 नए पार्षद और जोड़े गए, इन्हें विधान पार्षद कहा गया। दूसरे शब्दों में, गवर्नर जनरल के लिए नई विधान परिषद का गठन किया गया, जिसे भारतीय विधान परिषद कहा गया। परिषद की इस शाखा ने छोटी संसद की तरह कार्य किया। इसमें वही प्रक्रियाएं अपनाई गई, जो ब्रिटिश संसद में अपनाई जाती थी। इस प्रकार विधायकों को पहली बार सरकार के विशेष कार्य के रूप में जाना गया, जिसके लिए विशेष मशीनरी और प्रक्रिया की जरूरत थी।

2. सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का शुभारंभ किया गया। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा भारतीय नागरिकों के लिए भी खोल दी गई और इसके लिए 1854 में मैकाले समिति की नियुक्ति की गई।

3. कंपनी के शासन को विस्तारित कर दिया गया और भारतीय क्षेत्र को इंग्लैंड राजशाही के विश्वास के तहत कब्जे में रखने का अधिकार दिया गया। लेकिन पूर्व अधिनियमों के विपरीत इसमें किसी निश्चित समय का निर्धारण नहीं किया गया था। इससे स्पष्ट था कि संसद द्वारा कंपनी का शासन किसी भी समय समाप्त किया जा सकता था।

4. पहली बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारंभ किया गया। गवर्नर जनरल की परिषद में छु नए सदस्यों में से चार का चुनाव बंगाल, मद्रास, बंबई और आगरा की स्थानीय प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना था।

 

NOTE – 1858 to 1947 acts will be posted tomorrow

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