भारत का राष्ट्रपति

 

भारत का राष्ट्रपति ( president of India )

 

                                       CONTENT 

  1. परिचय
  2. राष्ट्रपति पद हेतु योग्यताएं
  3. राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया
  4. कार्यकाल
  5. महाभियोग की प्रक्रिया
  6. राष्ट्रपति की शक्तियां
  7. सामान्यकालीन शक्तियां , संकटकालीन शक्तियां |

 

  परिचय अनुच्छेद 52 के अनुसार भारत का एक राष्ट्रपति होगा। भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति की नियुक्ति चुनाव के द्वारा होती है। संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। यह चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है। इसका कार्यकाल पद ग्रहण करने से 5 वर्ष तक होता है। प्राया कार्यकाल पूरा हो जाने के पूर्व ही अथवा 6 माह के अंदर में राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न होना चाहिए। नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण करने तक पुराना राष्ट्रपति ही कार्य करता है।

राष्ट्रपति पद हेतु योग्यताएं

1) वह भारत का नागरिक हो।

2) वह 35 वर्ष या इससे अधिक आयु का हो।

3) वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।

4) वह किसी लाभ के पद पर न हो।

ज्ञातव्य हो कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल तथा संघ एवं राज्यों के मंत्रियों के पद को लाभ के पद नहीं माने जाएंगे।

 

राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया –

भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं होता। वह एक निर्वाचक मंडल द्वारा चुना जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं। उसका निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है।

राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के साथ ही राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों को इसलिए स्थान दिया गया है, क्योंकि राष्ट्रपति केवल केंद्रीय शासन का ही नहीं वरन् पूरे भारत राज्य का प्रधान है।

राष्ट्रपति पद के लिए मतदान गुप्त आधार पर होता है। विजयी होने वाले प्रत्याशी को मतों का न्यूनतम कोटा प्राप्त करना होता है। न्यूनतम कोटे का निर्धारण निम्नांकित सूत्र के आधार पर किया जाता है –

 

           वैध मतों की संख्या

———————————————————  +  1 

निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या +1 

 

क्योंकि राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होता है और विधानसभाओं के सदस्य अलग-अलग जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए निर्वाचक मंडल के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य उनकी जनसंख्या के अनुपात में निर्धारित किया जाता है ताकि उनके मतों में समानता लायी जा सके। इसके लिए तो सूत्र प्रयोग में लाए जाते हैं –

1. किसी राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य

 

    =          राज्य की कुल जनसंख्या

      —————————————————— ×1000

      राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 

 

2. संसद के प्रत्येक सदन के सदस्य के मत का मूल्य

 

=      समस्त राज्यों की विधानसभा के समस्त निर्वाचित सदस्यों के मतों का मूल्य

——————————————————————————————————————-

            संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या

 

इस प्रकार निर्वाचक मंडल के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य निर्धारण किया जाता है। मतों की गिनती करते समय प्रत्येक वोट को मूल्य के अनुसार गिना जाता है।

राष्ट्रपति का चुनाव एकल संक्रमणीय मत पद्धति के अनुसार होता है। इसमें प्रत्येक मतदाता को एक ही मत देने का अधिकार होता है। परंतु वह मतपत्र पर उम्मीदवारों के नामों के सामने अपनी पसंद के अनुसार 1,2 या 3 इत्यादि लिख देता है अर्थात् मतदाता यह कहना चाहता है कि जिसके नाम के समक्ष उसने एक लिखा है वह उसको अपना मत दे रहा है परंतु यदि वह निश्चित कोटा प्राप्त कर सके तो उसका मत 2 को या इसी प्रकार अगली प्राथमिकता वाले को हस्तांतरित कर दिया जाए।

मतगणना के समय पहले सभी उम्मीदवारों को मिले पहली प्राथमिकता के मतों की गणना की जाती है। यदि किसी उम्मीदवार को कुल डाले गए मतों के आधे से अधिक मत प्राप्त हो जाते हैं तो वह राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाता है। परंतु यदि किसी भी उम्मीदवार को निर्धारित न्यूनतम कोटा नहीं प्राप्त होता है तो सबसे कम मत पाने वाले उम्मीदवार के मतपत्रों में दूसरी पसंद देखी जाती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक कि किसी प्रत्याशी को न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं हो जाता।

राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित किसी भी विवाद का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाता है। निर्वाचन विषयक विवाद को छोड़कर राष्ट्रपति से संबंधित किसी भी विवाद का निर्णय संसद द्वारा किया जाता है।

 

कार्यकाल –

राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष है। इस अवधि के पूर्व भी वह त्याग पत्र दे सकता है अथवा महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा उसे इसके पूर्व भी अपदस्थ किया जा सकता है। किसी भी कारण से यदि राष्ट्रपति का पद समय से पूर्व खाली हो जाए तो संविधान यह प्रावधान करता है कि नए राष्ट्रपति का निर्वाचन अधिकतम 6 माह के भीतर हो जाना चाहिए। नए राष्ट्रपति की निर्वाचन तक उपराष्ट्रपति पद के दायित्व का निर्वाह करेगा। पुनः नए राष्ट्रपति का निर्वाचन 5 वर्ष की अवधि के लिए होगा न कि शेष अवधि के लिए।

 

महाभियोग की प्रक्रिया –

निश्चित अवधि के पूर्व राष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया व्यवहार में लाई जाती है। इसकी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 56 में वर्णित है। राष्ट्रपति पर महाभियोग संविधान के उल्लंघन के आरोप में लगाया जाता है। महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है बशर्ते कि –
1. प्रस्ताव प्रस्तुत करने की पूर्व सूचना कम से कम 14 दिनों पूर्व दे दी गई हो।

2. प्रस्ताव पर सदन के न्यूनतम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर हो।

यदि संबंधित सभी अपने विशिष्ट बहुमत (कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों की दो तिहाई बहुमत) द्वारा प्रस्ताव को पारित कर देता है तो प्रस्ताव दूसरे सदन को प्रेषित कर दिया जाता है। दूसरा सदन प्रस्ताव में उल्लिखित आरोपों की या तो स्वयं जांच करेगा या इसके लिए एक समिति की नियुक्ति करेगा। जांच के दौरान राष्ट्रपति स्वयं या अपने प्रतिनिधि के माध्यम से अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रकार विधिवत जांच के उपरांत दूसरा सदन यदि अपने कुल सदस्यों के दो तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग के प्रस्ताव को पारित कर देता है तो उसी तिथि से राष्ट्रपति अपने पद से मुक्त समझा जाएगा।

 

राष्ट्रपति की शक्तियां-

संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार, संघ के समस्त कार्यपालिकीय शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है, जिसका प्रयोग वह या तो स्वयं या अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों के माध्यम से करता है।

संघ के प्रधान के रूप में राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं। उसकी शक्तियों को वृहद रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

क) सामान्यकालीन शक्तियां,

ख) संकटकालीन शक्तियां।

(क) सामान्यकालीन शक्तियां ( normal power )
राष्ट्रपति की सामान्य कालीन शक्तियां चार वर्गों में विभाजित की जा सकती हैं –

1. कार्यपालिकीय अथवा प्रशासनिक शक्तियां,

2. विधायी शक्तियां,

3. वित्तीय शक्तियां,

4. न्यायिक शक्तियां।

1) कार्यपालिकीय अथवा प्रशासनिक शक्तियां संगी कार्यपालिका का प्रधान होने के नाते संघ के समस्त कार्य राष्ट्रपति के नाम से संपन्न होते हैं। कार्यपालिका क्षेत्र में राष्ट्रपति की मुख्य शक्तियां निम्नलिखित हैं –

– राष्ट्रपति द्वारा अनेक मुख्य पदाधिकारियों की नियुक्ति की जाती है, जैसे प्रधानमंत्री, उसके परामर्श से अन्य मंत्री, राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आदि।

– संघ का प्रधान होने के नाते वह वैदेशिक मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। वह विदेशों में भारत के राजदूतों, उच्चायुक्तों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करता है। अन्य देशों से संध्या और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं यद्यपि इनकी संसद द्वारा पुष्टि आवश्यक है।

– राष्ट्रपति को सैनिक क्षेत्र में भी काफी शक्तियां होती हैं। राष्ट्रपति भारत की तीनों सेनाओं का सेनाध्यक्ष होता है। युद्ध और शांति की घोषणा उसी के द्वारा की जाती है, यद्यपि इसकी स्वीकृति संसद द्वारा होना आवश्यक है।

2) विधायी शक्तियां राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है। उसे विधायी क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं –

– विधायी क्षेत्र का प्रशासन पूरी तरह से राष्ट्रपति के हाथों में है। संसद के सदनों की बैठक बुलाना, तथा स्थगित करना आदि उसी का दायित्व है। राष्ट्रपति प्रत्येक आम चुनाव के बाद और प्रत्येक नए वर्ष के प्रारंभ में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करता है।

– कुछ प्रतिवेदन और रिपोर्टें राष्ट्रपति के माध्यम से ही समस्त प्रस्तुत होती हैं, बजट संप्रेषण और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट, वित्त आयोग की संस्तुतियां आदि।

– कुछ विशेष विषयों से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जैसे नए राज्यों के निर्माण या पुराने राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित विधेयक, धन विधेयक आदि।

– संसद द्वारा पारित कोई विधेयक तभी कानून बनता है जब राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाए। किसी भी साधारण विधेयक के संदर्भ में राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं – वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दे, वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस कर दे, वह न ही विधेयक पर हस्ताक्षर करें और न ही इसे पुनर्विचार के लिए वापस करे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस करता है, और संसद पुनः विधेयक को पारित करके उसके पास हस्ताक्षर हेतु प्रेषित करती है, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य है।

– राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 ऐसे व्यक्तियों को मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान अथवा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान प्राप्त हो।

3) वित्तीय शक्तियां राष्ट्रपति को वित्तीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं। राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में संसद के दोनों सदनों के समक्ष वर्ष का आय-व्यय विवरण या बजट रखवाया जाता है। उसकी अनुमति के बिना धन विधेयक, वित्त विधेयक या अनुदान मांगे लोकसभा में प्रस्तुत नहीं की जा सकती।

‘भारत की आकस्मिकता निधि’ उसके नियंत्रण में होती है, जिसमें से व्यय के लिए वह धनराशि उपलब्ध करा सकता है, यद्यपि इसके लिए संसद की स्वीकृति आवश्यक है। उसके द्वारा हर 5 वर्ष पर एक वित्त आयोग का गठन किया जाता है। यह आयोग संघ और राज्यों के मध्य संसाधनों के बंटवारे के विषय में राष्ट्रपति को अपनी संस्तुति करता है।

4) न्यायिक शक्तियां वैसे तो भारत में न्यायपालिका को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया है, परंतु संघ का प्रधान होने के नाते राष्ट्रपति को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्रदान की गई हैं।

अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति उन अपराधियों को क्षमा कर सकता है अथवा उनके दंड को कम कर सकता है जो –
क) संघीय विधियों के विरुद्ध अपराध करने के कारण दंडित किए गए हो,
ख) सैनिक न्यायालय द्वारा दंडित किए गए हों,
ग) मृत्यु दंड के भागी माने गए हों।

 

(ख) संकटकालीन शक्तियां ( emergency power )

संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन उपबंध उल्लिखित है। यह उपबंध केंद्र को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं। संविधान में इन उपबंधों को जोड़ने का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तथा संविधान की सुरक्षा करना है।

आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार सर्वशक्तिमान हो जाता है तथा सभी राज्य केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं। ये संविधान में औपचारिक संशोधन किये बिना ही संघीय ढांचे को एकात्मक ढांचे में परिवर्तन कर देते हैं। राजनैतिक व्यवस्था का संघीय स्वरूप से आपातकाल में एकात्मक स्वरूप में इस प्रकार का परिवर्तन भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषता है।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का वर्णन किया गया है-
1) राष्ट्रीय आपातकाल(अनुच्छेद 352) यदि भारत की अथवा इसकी किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण के कारण खतरा उत्पन्न हो गया हो, तो अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा वास्तविक युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण से पहले भी कर सकता है, यदि वह समझे कि इनका आसन्न खतरा है।

राष्ट्रपति, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह अथवा आसन्न खतरे के आधार पर वह विभिन्न घोषणाएं भी जारी कर सकता है। चाहे उसने पहले से कोई घोषणा की हो या न की हो या ऐसी उद्घोषणा पहले से ही लागू हो। यह उपबंध 1975 में 38 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया है।

जब राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण के आधार पर की जाती है, तब इसे बाह्य आपातकाल के नाम से जाना जाता है। दूसरी ओर, जब इसकी घोषणा सशस्त्र विद्रोह के आधार पर की जाती है, तब इसे आंतरिक आपातकाल के नाम से जाना जाता है।

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा संपूर्ण देश अथवा केवल इसके किसी एक भाग पर लागू हो सकती है। 1976 के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रपति को भारत के किसी विशेष भाग पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने का अधिकार प्रदान किया है।

संसदीय अनुमोदन तथा समयावधि –

संसद के दोनों सदनों द्वारा आपातकाल की घोषणा जारी होने के 1 माह के भीतर अनुमोदित होनी आवश्यक है। प्रारंभ में संसद द्वारा अनुमोदन के लिए दी गई समय सीमा दो माह थी, किंतु 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा इसे हटा दिया गया।

यदि संसद के दोनों सदनों से इसका अनुमोदन हो गया हो तो आपातकाल के छह माह तक जारी रहेगा तथा प्रत्येक छह माह में संसद के अनुमोदन से इसे अनंत काल तक बढ़ाया जा सकता है।

आपातकाल की उद्घोषणा अथवा इश्क जारी रहने का प्रत्येक प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए जो कि है – अ) उस सदन के कुल सदस्यों का बहुमत, ब) उस सदन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत। इस विशेष बहुमत का प्रावधान 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा किया गया।

2) राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) अनुच्छेद 355 केंद्र को इस कर्तव्य के लिए विवश करती है कि प्रत्येक राज्य सरकार संविधान की प्रबंध व्यवस्था के अनुरूप ही कार्य करेगी। इस कर्तव्य के अनुपालन के लिए केंद्र, अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्य में संविधान तंत्र के विफल हो जाने पर राज्य सरकार को अपने नियंत्रण में ले सकता है। यह सामान्य रूप में राष्ट्रपति शासन के रूप में जाना जाता है। इसे राज्य आपातकाल या संवैधानिक आपात काल भी कहा जाता है।

1. अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति को घोषणा जारी करने का अधिकार देता है यदि वह आश्वस्त है कि वह स्थिति आ गई है कि राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुरूप नहीं चल सकती है। राष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल के रिपोर्ट के आधार पर या दूसरे ढंग से भी प्रतिक्रिया कर सकता है।

2. अनुच्छेद 365 के अनुसार यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने या उसे प्रभावी करने में असफल होता है, तो यह राष्ट्रपति के लिए विधि संगत होगा कि उस स्थिति को संभाले, जिसमें अब राज्य सरकार संविधान की प्रबंध व्यवस्था के अनुरूप नहीं चल सकती।

संसदीय अनुमोदन तथा समयावधि –

राष्ट्रपति शासन के प्रभाव की घोषणा जारी होने के 2 माह के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदन हो जाना चाहिए। यदि राष्ट्रपति शासन का घोषणापत्र लोकसभा के विघटित होने के समय जारी होता है या लोकसभा 2 माह के भीतर घोषणा पत्र को स्वीकृत किए बिना विघटित हो जाती है तब घोषणा पत्र लोकसभा की पहली बैठक की 30 दिन तक बना रहता है, बशर्ते राज्यसभा ने इसे निश्चित समय में स्वीकृत कर दिया हो।

यदि दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत हो तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता है, इसे अधिकतम 3 वर्ष की अवधि के लिए संसद की प्रत्येक छह माह की स्वीकृति से बढ़ाया जा सकता है।

राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी देने वाला प्रत्येक प्रस्ताव किसी भी सदन द्वारा सामान्य बहुमत द्वारा पारित किया जा सकता है। अर्थात् सदन में सदस्यों की उपस्थिति व मतदान का बहुमत।

44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 में संसद द्वारा राष्ट्रपति शासन को 1 वर्ष के बाद भी जारी रखने की शक्ति पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक उपबंध जोड़ा गया। अतः इसमें प्रावधान किया गया कि 1 वर्ष के पश्चात् राष्ट्रपति शासन को 6 माह के लिए केवल तब बढ़ाया जा सकता है जब निम्नलिखित परिस्थितियों पूरी हो-

1. यदि पूरे भारत में अथवा पूरे राज्य या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गई हो।

2. चुनाव आयोग या प्रमाणित करें कि संबंधित राज्य में विधानसभा के चुनाव के लिए कठिनाइयां उपस्थित हैं।

राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति शासन की घोषणा को किसी भी समय परिवर्ती घोषणा द्वारा वापस लिया जा सकता है। ऐसी घोषणा के लिए संसद की अनुमति आवश्यक नहीं होती।

3) वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) अनुच्छेद 360 राष्ट्रपति को वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने की शक्ति प्रदान करता है, यदि वह संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसमें भारत अथवा उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति खतरे में हो।

38 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1975 में कहा गया कि राष्ट्रपति की वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक है तथा किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्न योग्य नहीं है, परंतु 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 में इस उपबंध को समाप्त कर यह कहा गया कि राष्ट्रपति की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है।

संसदीय अनुमोदन एवं समयावधि –

वित्तीय आपात की घोषणा को, घोषित तिथि के 2 माह के भीतर संसद की स्वीकृति मिलना अनिवार्य है। यदि वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने के दौरान यदि लोकसभा विघटित हो जाए अथवा दो माह के भीतर इसे मंजूर करने से पूर्व लोकसभा विघटित हो जाए तो यह घोषणा पूर्व गठित लोकसभा की प्रथम बैठक के बाद 30 दिनों तक प्रभावी रहेगी, परंतु इस अवधि में इसे राज्यसभा की मंजूरी मिलना आवश्यक है।

एक बार यदि संसद के दोनों सदनों से इसे मंजूरी प्राप्त हो जाए, तो वित्तीय आपात अनिश्चित काल के लिए तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक इसे वापस न लिया जाए। यह दो बातों को इंगित करता है-

1. इसकी अधिकतम समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

2. इसे जारी रखने के लिए संसद की पुनः मंजूरी आवश्यक नहीं है।

वित्तीय आपातकाल की घोषणा को मंजूरी देने वाला प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन द्वारा सामान्य बहुमत द्वारा पारित किया जा सकता है अर्थात् सदन में उपस्थित सदस्यों की उपस्थिति एवं मतदान का बहुमत।

राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय एक अनुवर्ती घोषणा द्वारा वित्तीय आपात की घोषणा वापस ली जा सकती है। ऐसी घोषणा को किसी संसदीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

 

आपातकालीन उपबंधों की आलोचना

संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने संविधान में आपातकालीन उपबंध ओं के संबंध में निम्न आधार पर आलोचना की है-

1. संविधान का संगीत प्रभाव नष्ट होगा तथा केंद्र सर्वशक्तिमान बन जाएगा।

2. राज्यों की शक्तियां (एकल एवं संघीय दोनों) पूरी तरह से केंद्रीय प्रबंधन के हाथ में आ जाएंगी।

3. राष्ट्रपति ही तानाशाह बन जाएगा।

4. राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता निरर्थक हो जाएगी।

5. मूल अधिकार अर्थहीन हो जाएंगे और परिणाम स्वरूप संविधान की प्रजातंत्रीय आधारशिला नष्ट हो जाएगी।

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