सामाजिक समझौते का सिद्धांत (social contract theory)

 

 सामाजिक समझौते का सिद्धांत (social contract theory)

                             CONTENT :

  1. परिचय
  2. इस सिद्धांत का विकास
  3. थांमस हाब्स (1588 – 1679)
  4. जाॅन लाॅक (1632 – 1704)
  5. जीन जेकस रूसो (1712-1767)
  6. सामाजिक समझौता सिद्धांत की आलोचना

 

 

परिचय राज्य की उत्पत्ति के संबंध में सामाजिक समझौता सिद्धांत बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। 17 वीं और 18वीं सदी की राजनीतिक विचारधारा में तो इस सिद्धांत की पूर्ण प्रधानता थी। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य दैवीय न होकर एक मानवीय संस्था है जिसका निर्माण व्यक्तियों द्वारा पारस्परिक समझौते के आधार पर किया गया है। सिद्धांत के प्रतिपादक मानव इतिहास को दो भागों में बांटते हैं (1) प्राकृतिक अवस्था का काल, (2) नागरिक जीवन के प्रारंभ के बाद का काल। इस सिद्धांत के सभी प्रतिपादक अत्यंत प्राचीन काल में एक ऐसी प्राकृतिक अवस्था के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं जिसके अंतर्गत जीवन को व्यवस्थित रखने के लिए राज्य या राज्य जैसी कोई अन्य संस्था नहीं थी। सिद्धांत के प्रतिपादक ओं में स्थित प्राकृतिक अवस्था के संबंध में पर्याप्त मतभेद हैं कुछ ऐसे पूर्व सामाजिक और कुछ इसे पूर्व राजनीति अवस्था करते हैं। इस प्राकृतिक अवस्था के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार या प्राकृतिक नियमों के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करते थे। इस प्राकृतिक अवस्था के संबंध में मतभेद होते हुए भी सभी मानते हैं कि किसी कारण से मनुष्य प्राकृतिक अवस्था का त्याग करने को विवश हुए और उन्होंने समझौते द्वारा राजनीतिक समाज की स्थापना की। इस समझौते के परिणामस्वरुप प्रत्येक व्यक्ति की प्राकृतिक स्वतंत्रता आंशिक या पूर्ण रूप से समाप्त हो गई और स्वतंत्रता के बदले उसे राज्य व कानून की ओर से सुरक्षा का आश्वासन प्राप्त हुआ।

इस सिद्धांत का विकास समझौता सिद्धांत राजनीति के दर्शन की तरह ही पुराना है तथा इसे पूर्व और पश्चिम दोनों ही क्षेत्रों से समर्थन प्राप्त हुआ है। महाभारत के शांति पर्व में इस बात का वर्णन मिलता है कि पहले राज्य नहीं था, उसके स्थान पर अराजकता थी। ऐसी स्थिति में तंग आकर मनुष्य में परस्पर समझौता किया और मनु को अपना शासक स्वीकार किया। आचार्य कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में इस बात को अपनाया है कि प्रजा ने राजा को चुना और राजा ने प्रजा की सुरक्षा का वचन दिया।

यूनान में सबसे पहले सोफिस्ट वर्ग ने इस विचार का प्रतिपादन किया। उनका मत था कि राज्य एक कृत्रिम संस्था और एक समझौते का फल है। इपीक्यूरियन विचारधारा वाले वर्ग ने इसका समर्थन किया और रोमन विचारकों ने भी इस बात पर बल दिया कि “जनता राज्य सत्ता का अंतिम स्त्रोत है।” मध्य युग में भी यह विचार काफी प्रभावपूर्ण था और मेनगोल्ड तथा थामस एक्विनास के द्वारा इसका समर्थन किया गया।

16वीं और 17वीं सदी में यह विचार बहुत अधिक लोकप्रिय हो गए और लगभग सभी विचारक इसे मानने लगे। रिचर्ड हूकर ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक रूप में समझौते की तर्कपूर्ण व्याख्या की और डच न्यायाधीश ग्रोशियश पूफेण्डोर्फ तथा स्पिनोजा ने इसका पोषण किया, किंतु इस सिद्धांत का वैज्ञानिक और विधिवत रूप में प्रतिपादन हाब्स, लांक और रूसो द्वारा किया गया, जिन्हें ‘समझौतावादी विचारक’ कहा जाता है।

थांमस हाब्स (1588 – 1679)

थांमस हाब्स इंग्लैंड के निवासी थे और राजवंशी संपर्क के कारण उनकी विचारधारा राजतंत्रवादी थी। उनके समय में इंग्लैंड में राजतंत्र और प्रजातंत्र के समर्थकों के बीच तनावपूर्ण विवाद चल रहा था। इस संबंध में हाब्स का विश्वास था कि शक्तिशाली राजतंत्र के बिना देश में शांति और व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती। अपने इस विचार का प्रतिपादन करने के लिए उसने 1651 में प्रकाशित पुस्तक ‘लेवायथन’ (Leviathan) में समझौता सिद्धांत का वर्णन किया। उसने सामाजिक समझौते की व्याख्या इस प्रकार की है –

मानव स्वभाव हाब्स के समय में चल रहे इंग्लैंड के बीच में उसके सामने मानव स्वभाव का घृणित पक्ष ही रखा। उसने अनुभव किया कि मनुष्य एक स्वार्थी, अहंकारी और आत्मभिमानी प्राणी है। वह सदा ही से स्नेह करता है और शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है।

प्राकृतिक अवस्था इस स्वार्थी अहंकारी और आत्माभिमानी व्यक्ति के जीवन पर किसी प्रकार का नियंत्रण न होने का संभावित परिणाम यह हुआ कि प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक दूसरे मनुष्य को शत्रु की दृष्टि से देखने लगा और सभी भूखे भेड़ियों के समान एक दूसरे को निकल जाने के लिए घूमने लगे। मनुष्य को न्याय और अन्याय का कोई ज्ञान नहीं था और प्राकृतिक अवस्था ‘शक्ति ही सत्य है’ की धारणा पर आधारित थी।

समझौते का कारण जीवन और संपत्ति की सुरक्षा तथा मृत्यु और संहार कि इस भय ने व्यक्तियों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह इस असहनीय प्राकृतिक अवस्था का अंत करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक समाज का निर्माण करें।

समझौता नवीन समाज का निर्माण करने के लिए सब व्यक्तियों ने मिलकर एक समझौता किया। हाब्स के मतानुसार यह समझौता प्रत्येक व्यक्ति ने शेष व्यक्ति समूह से किया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक दूसरे व्यक्ति से कहता है कि “मैं इस शक्ति अथवा सभा को अपने अधिकार और शक्ति का समर्पण करता हूं जिससे कि वह हम पर शासन करें परंतु इसी शर्त पर कि आप भी अपने अधिकार और शक्ति का समर्पण इसे इसी रूप में करें और इसकी आज्ञाओं को माने।” इस प्रकार सभी व्यक्तियों ने एक व्यक्ति अथवा सभी के प्रति अपने अधिकारों का पूर्ण समर्थन कर दिया और यह शक्ति या सत्ता उस क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ता बन गई, यही राज्य का श्रीगणेश है।

नवीन राज्य का रूप हाब्स के समझौते द्वारा एक ऐसी निरंकुश राजतंत्रात्मक राज्य की स्थापना की गई है, जिसका शासक संपूर्ण शक्ति संपन्न है और जिसके प्रजा के प्रति कोई कर्तव्य नहीं है सासित वर्ग को शासक वर्ग के विरुद्ध विद्रोह का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

<

2 thoughts on “सामाजिक समझौते का सिद्धांत (social contract theory)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *