सामाजिक समझौते का सिद्धांत (social contract theory)

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(John lock) जाॅन लाॅक (1632 – 1704)

जाॅन लाॅक इंग्लैंड का ही एक अन्य दार्शनिक था, जिसने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन 1690 में प्रकाशित पुस्तक ‘two treaties on government’ में किया है। इस पुस्तक के प्रकाशन के 2 वर्ष पूर्व इंग्लैंड में गौरवपूर्ण क्रांति हो चुकी थी, जिसके द्वारा राजा के विरुद्ध पार्लियामेंट की अंतिम सत्ता को स्वीकार कर लिया गया था। लाॅक ने अपनी पुस्तक में इन परिस्थितियों का स्वागत करते हुए सीमित या वैधानिक राजतंत्र का प्रतिपादन किया। जॉन ने अपने समझौता सिद्धांत की व्याख्या निम्न प्रकार से की है –

मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था लाॅक के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसमें प्रेम, सहानुभूति, सहयोग एवं दया की भावनाएं विद्यमान थी। मानव स्वभाव की इस सामाजिकता के कारण प्राकृतिक अवस्था संघर्ष की अवस्था नहीं हो सकती थी, बल्कि यह तो स्वयं की इच्छा, सहयोग और सुरक्षा की व्यवस्था थी। लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था नियम विहीन नहीं थी, वरन् उसके अंतर्गत यह नियम प्रचलित था – ‘तुम दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करो जैसा व्यवहार तुम दूसरों से अपने पति चाहते हो'( do unto others as you want others to do unto you)। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य को प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे और प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का आदर करता था, इसमें मुख्य अधिकार जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के थे।

समझौते के कारण इस आदर्श प्राकृतिक अवस्था में कालांतर में व्यक्तियों को कुछ ऐसी सुविधाएं अनुभव इन सुविधाओं को दूर करने के लिए व्यक्तियों ने प्राकृतिक अवस्था का त्याग करना उचित समझा। लॉक के अनुसार यह असुविधाएं निम्नलिखित थी:

(क) प्रकृति के नियमों की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं थी, (ख) इन नियमों की व्याख्या करने के लिए कोई योग्य सभा नहीं थी, (ग) इन नियमों को मनवाने के लिए कोई शक्ति नहीं थी।

समझौता लाॅक के सिद्धांत के अंतर्गत राज्य का निर्माण करने के लिए केवल एक ही समझौता किया गया, परंतु लाॅक के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि दो समझौते किए गए। 1 – समझौते द्वारा प्रकृतिक अवस्था का अंत करके समाज की स्थापना की गई। इस समझौते का उद्देश्य व्यक्तियों के जीवन स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा है। 2 – इस समझौते के अनुसार शासित वर्ग के द्वारा शासक को कानून बनाने, उनकी व्याख्या करने और उन्हें लागू करने का अधिकार दिया जाता है, परंतु शासक की शक्ति पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि उसके द्वारा निर्मित कानून अनिवार्य रूप से प्राकृतिक नियमों के अनुकूल और अनुरूप होंगे तथा वे जनता के हित में ही होंगे।

नवीन राज्य का स्वरूप लॉक के सामाजिक समझौता सिद्धांत के अंतर्गत शासक और शासित के मध्य जो समझौता संपन्न हुआ है, उससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं एक लक्ष्य नहीं बल्कि एक लक्ष्य की प्राप्ति का साधन मात्र है और वह लक्ष्य है शांति और व्यवस्था स्थापित करना और लोक कल्याण। लाॅक इस विचार का प्रतिपादन करता है, कि यदि सरकार अपने उद्देश्य में असफल हो जाती हैं तो समाज को इस प्रकार की सरकार के स्थान पर दूसरी सरकार स्थापित करने का पूर्ण अधिकार है। इस प्रकार ब्लॉक के द्वारा एक ऐसी शासन व्यवस्था का समर्थन किया गया, जिसमें वास्तविक एवं अंतिम शक्ति जनता में निहित होती है और सरकार का अस्तित्व तथा रूप जनता की इच्छा पर निर्भर करता है।

(Jean jeckus Rousseau) जीन जेकस रूसो (1712-1767)

रूसो ने अपने सामाजिक समझौता सिद्धांत का प्रतिपादन 1762 में प्रकाशित पुस्तक सामाजिक समझौता (the social contract) में किया है। हाॅब्स, लाॅक के समान रूसो के द्वारा इस सिद्धांत का प्रतिपादन किसी विशेष उद्देश्य से नहीं किया गया था, लेकिन रूसो ने जिस प्रकार से अपने सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, उससे वह प्रजातंत्र का अग्रदूत बन जाता है। रूसो के द्वारा अपने सिद्धांत की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है-

मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था रूसो अपनी पुस्तक ‘सामाजिक समझौता’ में लिखता है, “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है किंतु वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है।” इस वाक्य से रूसो इस तथ्य का प्रतिपादन करता है कि “मनुष्य मौलिक रूप से अच्छा है और सामाजिक बुराइयां ही मानवीय अच्छाई में बाधक बनती है।” प्राकृतिक अवस्था के व्यक्ति के लिए रूसो ‘आदर्श बर्बर’ शब्द का प्रयोग करता है। यह आदर्श बर्बर अपने में ही इतना संतुष्ट था कि ना तो उसे किसी साथी की आवश्यकता थी और ना किसी का अहित करने की उसकी इच्छा थी। इस प्रकार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति एक भोले और अज्ञानी बालक की भांति सादगी और परम सुख का जीवन व्यतीत करता था। इस प्रकार प्राकृतिक अवस्था पूर्ण स्वतंत्रता एवं समानता और पवित्र तथा कपट रहित जीवन की अवस्था थी, परंतु इस प्राकृतिक अवस्था में विवेक का नितांत अभाव था।

समझौते का कारण प्राकृतिक अवस्था आदर्श अवस्था थी, लेकिन कुछ समय बाद ऐसे कारण उत्पन्न हो गये, जिन्होंने इस अवस्था को दूषित कर दिया। कृषि के आविष्कार के कारण भूमि पर स्थाई अधिकार और इसके परिणाम स्वरुप संपत्ति तथा मेरे तेरे की भावना का विकास हुआ। जब प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक भूमि पर अधिकार करने की इच्छा करने लगा तो शांति का जीवन नष्ट हो गया और समाज की लगभग वही दशा हुई जो हाॅब्स की प्राकृतिक दशा में थी। रूसो संपत्ति को समाज की स्थापना के लिए उत्तरदाई मानता है। प्राकृतिक भाषा का रूप नष्ट होकर युद्ध, संघर्ष और विनाश का वातावरण उपस्थित हो गया। युद्ध और संघर्ष के वातावरण का अंत करने के लिए व्यक्तियों ने पारस्परिक समझौते द्वारा समाज की स्थापना का निर्णय किया।

समझौता इस असहनीय स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के लिए सभी व्यक्ति एक स्थान पर एकत्रित हुए और उनके द्वारा अपनी संपूर्ण अधिकारों का समर्पण किया गया, किंतु अधिकारों का यह संपूर्ण समर्पण किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं वरन् संपूर्ण समाज के लिए किया गया। समझौते के परिणामस्वरुप संपूर्ण समाज की एक सामान्य इच्छा उत्पन्न होती है और सभी व्यक्ति इस सामान्य इच्छा के अंतर्गत रहते हुए कार्यरत रहते हैं। स्वयं रूसो के शब्दों में, समझौते के अंतर्गत, “प्रत्येक अपने व्यक्तित्व और अपनी पूर्ण शक्ति को सामान्य प्रयोग के लिए सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशक के अधीन समर्पित कर देता है तथा एक समूह के रूप में अपने व्यक्तित्व तथा अपनी पूर्ण शक्ति को प्राप्त कर लेता है।” इस प्रकार के हस्तांतरण से सभी पक्षों को लाभ है।

इस प्रकार रूसो के समझौते द्वारा एक लोकतांत्रिक समाज की स्थापना होती है जिसके अंतर्गत संप्रभुता संपूर्ण समाज में निहित होती है और यदि सरकार सामान्य इच्छा के विरुद्ध शासन करती है तो जनता को ऐसी सरकार को पद मुक्त करने का अधिकार प्राप्त होता है।

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