व्यवहारवाद

व्यवहारवाद की उपयोगिता या प्रभाव

व्यवहारवादी क्रांति के प्रारंभिक दौर ने परंपरागत विचारकों और व्यावहारिक विचारकों के बीच शीत युद्ध के जिस वातावरण को जन्म दिया था, वह आज समाप्त हो चुका है और हमने एक ऐसी स्थिति में प्रवेश कर लिया है, जिसमें व्यवहारवाद का उचित मूल्यांकन संभव है। व्यवहारवाद की निश्चित रूप में अपनी कुछ उपयोगितायें हैं, जिसका उल्लेख निम्न रूपों में किया जा सकता है –

1. व्यवहारवाद केवल मात्र एक उपागम या दृष्टिकोण मात्र नहीं है, वरन् यह तो राजनीति विज्ञान की समस्त विषय वस्तु को नवीन रूप में प्रस्तुत करने का एक साधन है। व्यवहारवाद केवल सुधार ही नहीं वरन् पुनर्निर्माण क्रिया है तथा इसने राजनीति विज्ञान को नए मूल्य, नई भाषा, नई पद्धतियां, उच्चतर प्रस्थिति, नवीन दिशाएं और सबसे बढ़कर अनुभवात्मक वैज्ञानिकता प्रदान की है।

2. व्यवहारवाद ने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण को व्यापक बनाया और उन्हें इस बात के लिए प्रेषित किया गया है कि एक समाज विज्ञान का अध्ययन दूसरे समाज विज्ञान के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए। व्यवहारवादियों के इस विचार को अत्यंत अनुशासनात्मक दृष्टिकोण कहा जा सकता है।

3. राज्य वैज्ञानिक अब तक सामान्यतया ऐसे दार्शनिकों के रूप में कार्य करते रहे हैं जो केवल नैतिक मूल्यों व आदर्शों से ही संबंध रखते थे। व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को यथार्थ के धरातल पर खड़ा करने का कार्य किया है। उसने इस बात पर जोर दिया है कि राज वैज्ञानिक का संबंध ‘क्या है’ से है न कि ‘क्या होना चाहिए’ से। व्यवहारवाद में संस्थाओं के स्थान पर व्यक्ति को राजनीतिक विश्लेषण की इकाई बनाने पर जोर देने की बात कही है वह इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इस प्रकार उसने राजनीति विज्ञान को एकता और आधुनिकता प्रदान की है।

4. व्यवहारवाद ने अपने वैज्ञानिक अनुभववाद के माध्यम से नवीन दृष्टि, नवीन पद्धतियां, नए मापक और नूतन क्षेत्र प्रदान किए हैं। व्यवहारवाद के परिणामस्वरूप ही राजनीति विज्ञान साक्षात्कार प्रणाली, मूल प्रश्नावली, प्रणाली सर्वेक्षण प्रणाली, केस प्रणाली ,अंक शास्त्रीय प्रणाली और सोशियोमेट्री आदि अपनाने की ओर प्रवृत्त हुआ है। राजनीति के अंतर्गत अब न केवल मतदान व्यवहार वरन् राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं का अध्ययन भी इस पद्धति के आधार पर किया जाने लगा है।

व्यवहारवाद की आलोचना

एक और व्यवहारवाद की जहां अपनी कुछ उपयोगितायें हैं वही दूसरी ओर व्यवहारवाद की अपनी अनेक दुर्बलतायें भी हैं। व्यवहारवाद की आलोचना के कुछ बिंदुओं का संछिप्त विवेचन इस प्रकार है –

1. व्यवहारवाद की सबसे प्रमुख कमजोरी उसकी मूल्य निरपेक्षता है, जिसके फलस्वरूप राजनीति विज्ञान नीति निर्माण, सक्रिय राजनीति, समाज के तत्कालिक और दूरगामी समस्याओं आदि से पूर्णतया पृथक् हो गया है। यदि मूल्य निरपेक्षता ही हमारा उद्देश्य है, तो फिर प्रजातंत्र और तानाशाही सभी व्यवस्थाएं बिल्कुल समान हो जाती हैं और एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे आर्नल्ड वेस्ट ने ’20वीं सदी की दुकान घटना’ कहा है। लियो स्ट्रास के अनुसार ‘मूल्य निरपेक्षता का परिणाम गटर की बिजय ही हो सकता है और यही हुआ।’

2. व्यवहारवादी एक साथ ही मर्यादित और अहंकारी दोनों रूपों में सामने आते हैं। एक ओर तो वे अपने निष्कर्षों और मान्यताओं आदि को सापेक्ष मानते हैं और इस दृष्टि से वे मर्यादित हैं, लेकिन दूसरी ओर वे किसी भी ऐसे तत्व के अस्तित्व को महत्त्व देने के लिए तैयार नहीं है, जिसे गिना, तोला या न पाना जा सके। यह उनकी विचारधारा का अहंकारी पक्ष है और इस दृष्टि से उनमें व धार्मिक कट्टरपंथियों में कोई अंतर नहीं रह जाता।

3. रैमिनी, किर्क पैट्रिक, डैल, डायस आदि सभी ने यह आलोचना की है कि व्यवहारवादियो ने अब तक मानव व्यवहार का विज्ञान प्रस्तुत नहीं किया, यद्यपि वे लाखों डालर इस व्ययसाध्य लक्ष्य की पूर्ति के लिए खर्च करा चुके हैं। एक विश्वसनीय व्यापक और संतोषप्रद राजनीति का विज्ञान अभी तक मृगतृष्णा ही बना हुआ है।

4. दुर्भाग्यवश व्यवहारवादी इस बात को भुला देते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान और राजनीति विज्ञान के तथ्यों में गंभीर अंतर है। राजनीति विज्ञान के तत्व प्राकृतिक विज्ञानों के तथ्यों की तुलना में बहुत अधिक जटिल, अत्यधिक परिवर्तनशील, न्यून मात्रा में प्रत्यक्षत: पर्यवेक्षणीय, कम समरूप और कार्य के उद्देश्य से परिपूर्ण होते हैं। इन कारणों से राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक या भौतिक विज्ञानों के समान बनाने का प्रयास अत्यंत कठिन है।

5. व्यवहारवादियों की कमजोरी उनके द्वारा पद्धतियों पर अत्यधिक जोर देने के कारण भी है। एवरी लिसरसन ने यह पाया है कि ‘ये महत्वपूर्ण को छोड़कर प्रायः अमहत्वपूर्ण विषयों के संबंध में तथ्य और आंकड़े एकत्रित करने में लगे रहते हैं।’

6. व्यवहारवादियों की स्थिति इस दृष्टि से भी असंगतिपूर्ण है कि एक ओर वे अपने आपको मूल्य निरपेक्षतावादी मानते हैं, लेकिन दूसरी ओर एक भी ऐसा व्यवहारवादी नहीं है, जो उदार प्रजातंत्र में विश्वास न करता हो। वस्तुस्थिति यह है कि व्यवहारवादियो ने स्थायित्व को पूर्व धारणा के रूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक लक्ष्य बना लिया है और वे रूढ़ीवादी बन गये हैं।

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