उपयोगितावाद का सिद्धांत : बेंथम

उपयोगितावाद का सिद्धांत : बेंथम ( theory of utilitarianism : bentham )

 

                  संदर्भ :

  • उपयोगितावाद का अर्थ,
  • उपयोगितावाद सिद्धांत के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ,
  • उपयोगितावाद की आलोचनाएं,

उपयोगितावाद का सिद्धांत बेंथम की सबसे महत्वपूर्ण एवं अमूल्य देन है। उसके अन्य सभी राजनीतिक विचार उसके उपयोगितावाद पर ही आधारित हैं। लेकिन उसे इसका प्रवर्तक नहीं माना जा सकता। रोचक बात यह है कि बेंथम ने कहीं भी उपयोगितावाद शब्द का प्रयोग नहीं किया। बेंथम की उपयोगितावादी दर्शन का वर्णन उसकी दो पुस्तकों ‘fragments on the government’ तथा ‘introduction to the principles of morals and legislation’ में मिलता है।

उपयोगितावाद का अर्थ

उपयोगितावाद 18वीं शताब्दी के आदर्शवाद के विरुद्ध एक प्रक्रिया है, जो इंद्रियानुभववाद की स्थापना करता है। उपयोगितावादियों की दृष्टि में उपयोगितावाद का अर्थ अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है। इसका अर्थ किसी वस्तु का वह गुण है, जो लाभ, सुविधा, आनंद, भलाई या सुख प्रदान करता है तथा अनिष्ट, कष्ट, बुरा या दुख को पैदा होने से रोकता है। बेंथम के अनुसार “उपयोगिता किसी कार्य या वस्तु का वह गुण है, जिससे सुखों की प्राप्ति तथा दुखों का निवारण होता है।” बेंथम ने आगे कहा है कि उपयोगितावाद की अवधारणा हमें यह बताती है कि हमें क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए। यह हमारे जीवन के समस्त निर्णयों की आधारशिला है। उपयोगितावाद का वास्तविक अर्थ सुख है। व्यक्ति ही नहीं संपूर्ण समाज का लक्ष्य भी सुख की प्राप्ति है।

उपयोगितावाद सिद्धांत के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु –

1) सुख और दुख पर आधारित – बेंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत सुख और दुख के दो आधारों पर आधारित है। बेंथम का मानना है कि जो कार्य में सुख देता है, उपयोगी है तथा जो कार्य दुख पहुंचाता है, उपयोगी नहीं। बेंथम का मानना है कि प्रकृति ने मनुष्य को सुख और दुःख की दो शक्तियों के अधीन रखा है। यही शक्तियां हमें बताते हैं कि मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। सही और गलत के मानदंड उन शक्तियों से बंधे हुए हैं।

2) सुख की प्राप्ति और दुख का निवारण – बेंथम का मत है कि जो वस्तु सुख प्रदान करती है वह अच्छी है और उपयोगी है। जिस कार्य या वस्तु से मनुष्य को दुःख प्राप्त होता है वह अनुपयोगी है। मानव के समस्त कार्यों की कसौटी उपयोगितावाद है। बेंथम का मानना है कि जिस कार्य से प्रसन्नता या आनंद में वृद्धि होती है, तो वह कार्य उपयोगी है। उससे सुख की प्राप्ति होती है और दुख का निवारण होता है। अतः उपयोगितावाद का सिद्धांत सुख की प्राप्ति और दुःख के निवारण का सिद्धांत है।

3) सुख और दुःख का वर्गीकरण – बेंथम ने सुख-दुःख को दो भागों (सरल व जटिल) में विभाजित किया है। उसके अनुसार सरल सुख 14 प्रकार के तथा सरल दुःख 12 प्रकार के हैं। सरल सुख हो या दुःख को परस्पर मिलाने से जटिल सुख या दुःख का जन्म होता है।

1. सरल सुख – (1) मित्रता का सुख, (2) इंद्रिय सुख, (3) सहायता का सुख, (4) संपर्क सुख, (5) दया का सुख, (6) स्मरण शक्ति का सुख, (7) आशा का सुख, (8) सत्ता का सुख, (9) धार्मिकता का सुख, (10) ईर्ष्या का सुख, (11) उदारता का सुख, (12 संपत्ति का सुख, (13) कुशलता का सुख, (14) यात्रा का सुख।

2. सरल दुऊख – (1)अपमान का दुःख, (2)धर्मनिष्ठा का दुःख, (3)संपर्क का दुःख, (4)कल्पना का दुःख, (5)शत्रुता का दुःख, (6)इंद्रिय दुःख, (7)अभाव का दुःख, (8)स्मरण शक्ति का दुःख, (9)उदारता का दुःख, (10)आशा का दुःख, (11)ईर्ष्या का दुःख, (12)अकुशलता का दुःख।

4) सुख-दुःख के स्त्रोत – बेंथम सुख-दुःख के चार स्त्रोत – धर्म, राजनीति, नैतिकता तथा भौतिक मानते हैं। धार्मिक सुख धर्म में आस्था रखने से तथा धार्मिक व्यवस्था को स्वीकार करने से प्राप्त होता है। जैसे कुंभ के मेले में स्नान करना। यदि वहां कोई अनहोनी हो जाए तो उसे धार्मिक दुःख कहा जाएगा। राजनीतिक सुःख राज्य की नीतियों व कार्यों से प्राप्त होता है। जैसे सरकार द्वार धर्मनिरपेक्ष नीति का पालन करना। यदि सरकार कोई ऐसा कार्य करे जो जनकल्याण के विपरीत हो तो उससे प्राप्त दुःख राजनीतिक दुख होगा। व्यक्ति को नैतिक सुख उसके नैतिक आचरण से प्राप्त होता है जैसे दूसरों की सहायता करना। यदि आवश्यकता पड़ने पर तुम्हें कोई सहायता न मिले तो उससे प्राप्त दुःख नैतिक दुःख कहलाएगा। भौतिक सुख प्राकृतिक वस्तुओं से प्राप्त होता है। जैसे संतुलित वर्षा का होना सभी को सुख प्रदान करता है। यदि वर्षा अत्यधिक मात्रा में होकर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दे तो इससे प्राप्त दुःख भौतिक या प्राकृतिक दुःख कहलाएगा।

5) सुखों में मात्रात्मक अंतर – बेंथम का मानना है कि सभी सुख गुणों में एक जैसे होते हैं। इसलिए उनमें गुणात्मक की बजाय मात्रात्मक अंदर पाया जाता है। उसका कहना है कि “पुष्पिन (बच्चों का खेल) उतना ही अच्छा है, जितना कविता पढ़ना” खेलने से भौतिक सुख प्राप्त होता है, जबकि कविता पढ़ने से मानसिक सुख। दोनों सुखों की मात्रा को मापा जा सकता है। बेंथम ने कहा है कि एक कील भी उतना ही दर्द करती है, जितना कर्कश आवाज। अतः सुखों में मात्रात्मक अंतर है, गुणात्मक नहीं।

6) सुख दुःख का मापन – बेंथम के अनुसार सुख-दुःख को प्रमाणिक तौर पर मापा जा सकता है। इससे कोई अपने सुख या दुःख को माप सकता है। यह मापन हीं किसी वस्तु या कार्य को सुख-दुःख के आधार पर अच्छा या बुरा प्रमाणित कर सकता है। यह सुख-दुःख मानवीय क्रियाओं के आचार व उद्देश्य होते हैं। इन सुखों को हीडनेस्टिक कैलकुलस द्वारा मापा जा सकता है।

7) सुखवादी मापक यंत्र (hedonistic calculus) – बेंथम का विचार है कि सुख-दुःख को तुलनात्मक आधार पर रखा जा सकता है। बेंथम ने सुख-दुःख के मापन की जो पद्धति सुझाई है, उसे सुखवादी मापक यंत्र का नाम दिया गया है। बेंथम का मानना है कि सुख दुःख का गणित के सहारे प्रमाणिक नापतोल संभव है। इस सिद्धांत के अंतर्गत 1. तीव्रता (intensity), 2. अवधि (duration), 3. निश्चितता (certainty), 4. निकटता अथवा दूरता (propinquity or remoteness), 5. जनन शक्ति (fecundity), 6. विशुद्धता (purity) 7. विस्तार (extent)। बेंथम के विचारों को स्पष्ट करते हुए वेपर ने लिखा है “जब हम सुखों की गणना करते हैं तो हमें उनकी तीव्रता और स्थिरता को ध्यान में रखना चाहिए। हमें उनके निश्चितता और अनिश्चितता का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि वह सुख जो अधिक निश्चित होता है उस सुख की तुलना में अधिक होता है जो सुख कम निश्चित होता है। उनकी निकटता एवं दूरी भी हमारे गणना में आनी चाहिए। वह सुख जो अधिक निकट होता है अथवा अधिक सरलता से प्राप्त होता है, उस सुख से अधिक होता है जो दूर होता है और जिसे पाने में अधिक कठिनाई होता है। हमें उनकी जनन शक्ति और उनकी विशुद्धता पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि ऐसा सुख अधिक आनंददायक होता है, जिसके पीछे उसी प्रकार के अन्य सुख भी जुड़े हों।

8) परिणामों पर जोर – बेंथम का उपयोगितावाद का सिद्धांत परिणामों पर आधारित है नियत पर नहीं। बेंथम का मानना है कि सुख और दुःख स्वयं ही उद्देश्य हैं। इनके होते हुए अच्छे या बुरे इरादों को मानने की आवश्यकता नहीं। किसी भी कार्य की अच्छाई या नैतिकता इस बात पर निर्भर नहीं करते कि वह किस उद्देश्य को लेकर किया जाता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि उसके परिणाम क्या निकलते हैं। बेंथम का मानना है कि किसी भी विधि या संस्था की उपयोगिता की जांच इस आधार पर ही हो सकती है कि स्त्रियों या पुरुषों पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है। बेंथम नियत को उसी सीमा तक स्वीकार करता है जहां तक वह परिणाम को निर्धारित करती है। इस प्रकार उसने नैतिक बुद्धि, ईश्वरीय इच्छा, कानून के नियम आदि की बलि चढ़ा दी। उसने किसी वस्तु के परिणाम को ही सत्य-असत्य, बुराई-अच्छाई का मापदंड स्वीकार किया है।

9) राज्य का उद्देश्य अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है – बेंथम के अनुसार राज्य के वे कार्य ही उपयोगी हैं जो व्यक्तियों को लाभ पहुंचाते हैं। सभी व्यक्ति राज्य के आदेशों का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वे उनके लिए उपयोगी हैं। राज्य का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को सुख प्रदान करना नहीं है बल्कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को सुख प्रदान करना है। इसलिए बेंथम कहते हैं कि व्यक्ति को अधिक से अधिक लोगों के कल्याण में राज्य को सहयोग देना चाहिए।

10. अनुशस्तयों का सिद्धांत – बेंथम का मानना है कि व्यक्ति के अधिकतम सुख तथा व्यक्तियों के अधिकतम सुख के मध्य संघर्ष की संभावना को देखते हुए व्यक्ति पर अंकुश लगाना आवश्यक होता है ताकि वह दूसरों के सुख को हानि नहीं पहुंचाये। इसलिए दूसरों के सुखों का ध्यान रखने में व्यक्ति को प्रेरित करने के लिए कुछ अनुशस्तियों की आवश्यकता पड़ती है। सुख की अनुशस्तियां चार प्रकार (शारीरिक, नैतिक, धार्मिक और राजनीतिक) की होती हैं। धार्मिक अनुशस्ति व्यक्ति के आचरण को ठीक करती है, नैतिक अनुशस्ति व्यक्ति के मन को अनुशासित करती है। राजनीतिक अनुशस्ति राज्य द्वारा पुरस्कार और दंड के रूप में व्यक्तियों पर लगाई जाती है। इसे कानूनी अनुशस्ति भी कहा जाता है।

उपयोगितावाद की आलोचनाएं

बेंथम ने अपने उपयोगितावाद के सिद्धांत को सरल और सुबोध बनाने का इतना अधिक प्रयास किया है कि इस सिद्धांत में अनेक दोष उत्पन्न हो गए हैं। आलोचकों ने उसके इस सिद्धांत को भ्रम एवं विरोधाभास का पिटारा कह दिया। इसकी आलोचना के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –

1) मौलिकता का अभाव – यह सिद्धांत बेंथम की मौलिक देन नहीं है। बेंथम ने प्रीस्टले के विचारों को ही नया रूप देने का प्रयास किया है। बेंथम ने भी प्रीस्टले के ही इस विचार को उधार लिया है कि ‘राज्य का उद्देश्य अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख प्रदान करना है।’ अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख का विचार प्रीस्टले के माध्यम से बेंथम तक पहुंचा। अतः इसमें मौलिकता का अभाव है।

2) अमनोवैज्ञानिक सिद्धांत – बेंथम के अनुसार मनुष्य घोर स्वार्थी और अपने सुख के लिए प्रयास करने वाला प्राणी है। किंतु सत्य तो यह है कि मनुष्य स्वार्थी के अलावा परोपकारी भी है। वह दूसरों के लिए भी जीवन जीता है। वह सुख की भावना से ही नहीं बल्कि देश प्रेम, बलिदान, त्याग आदि भावनाओं से भी प्रेरित होकर कार्य करता है। ईसा मसीह ने मृत्यु को गले क्यों लगाया? राम वन में क्यों गए? इन सब के पीछे एक ही कारण था- परोपकार। इस प्रकार बेंथम ने आध्यात्मिक विकास एवं उच्च आदर्शों की अवहेलना करके केवल सुख को ही महत्व दिया है। अतः यह सिद्धांत अमनोवैज्ञानिक है जो मानव प्रकृति का गलत चित्रण करता है।

3) सुखवादी मान्यता दोषपूर्ण है – बेंथम केवल सुख को ही मानवीय क्रियाओं का एकमात्र प्रेरक कारण मानते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि संसार में केवल मात्र सुख को ही प्रेरक मान लिया जाए तो सुखों की प्राप्ति की होड़ लग जाएगी। इससे कर्तव्य व स्वार्थ का संघर्ष समाप्त हो जाएगा। यदि भौतिक सुख ही सब कुछ होता तो कवी कविता की रचना नहीं करते ? महात्मा बुद्ध राज्य से ठाठबाट का त्याग नहीं करते ? जिस प्रकार सुख की खोज मानव स्वभाव का अंग है उसी प्रकार देशभक्ति, त्याग, परोपकार आदि की भावनाएं भी उसके स्वभाव का अंग हैं। मानव जीवन आदर्शों पर आधारित है न कि सुखवादी दृष्टिकोण पर।

4) सुखवादी मापन यंत्र दोषपूर्ण है – बेंथम द्वारा बताई गई इस विधि से सुखों के मात्रा को सही ढंग से मापना असंभव है। बेंथम ने सुख मापन के विभिन्न तत्वों के तुलना की मूल्यांकन करने की निश्चित पद्धति नहीं बतायी है। उदाहरण के लिए यदि एक सुख की तीव्रता (intensity) कम तथा अवधि (duration) अधिक हो तथा दूसरे की तीव्रता (intensity) अधिक तथा अवधि (duration) कम हो तो दोनों सुखों की मात्रा और श्रेष्ठता का निर्धारण कैसे हो ? इस विषय पर बेंथम कुछ नहीं कह सका। व्यक्तियों की रुचि, समय और परिस्थितियों के कारण सुख दुःख में भी परिवर्तन आता रहता है। एक समय पर सुख देने वाली वस्तु दूसरे समय दुःख भी प्रदान कर सकती है। अतः सुखवादी मापन यंत्र में अस्पष्टता तथा अनिश्चितता है।

5) बहुसंख्यकों की निरंकुशता – बेंथम का सिद्धांत प्रत्येक व्यक्ति के सुख पर नहीं बल्कि बहु संख्या के सुख पर जोर देता है। यदि बहुसंख्यक अपने आनंद के लिए अल्पसंख्यकों को दास भी बनाना चाहे तो उचित है। इस दशा में अल्पसंख्यकों का सुख बहुसंख्यकों के सुख के नीचे हमेशा दफन रहेगा। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से यह सिद्धांत बहुसंख्यकों के अत्याचार को उचित व न्यायपूर्ण ठहराता है। इसलिए यदि सुख स्वाभाविक प्रवृत्ति है तो उसे प्राप्त करने का अधिकार सभी को मिलना चाहिए। अतः यह सिद्धांत बहुसंख्यकों के अत्याचार व अन्याय को प्रोत्साहन देता है।

6) सुखों के गुणात्मक भेद की उपेक्षा – बेंथम के अनुसार विभिन्न वस्तुओं और कार्यों से प्राप्त सुख मात्रात्मक होता है गुणात्मक नहीं। उसका कहना है कि आनंद की जितनी मात्रा घर पर रहने से मिलती है उतनी ही घूमने से मिलती है। दोनों सुखों में मात्रात्मक अंतर होता है। लेकिन सत्य तो यह है कि एक चित्रकार को चित्र बनाने में जो आनंद प्राप्त होता है, वह उस चित्र को देखने वाले के आनंद से अलग होता है। स्वादिष्ट वस्तुओं से मिलने वाला आनंद खेलने से प्राप्त होने वाले आनंद से भिन्न है। इन सब में मात्रात्मक भेद के साथ-साथ गुणात्मक भेद भी होता है। घर पर लेटे रहना एक निम्न कोटि का आनंद है, एवरेस्ट पर चढ़ना एक उत्कृष्ट कोटि का आनंद है। अतः बेंथम का सिद्धांत गुणों की उपेक्षा करने के कारण दोषपूर्ण है। बेंथम के शिष्य जे. एस. मिल ने भी इस भूल को स्वीकार किया है।

7) अतर्कसंगत – बेंथम ने एक सुख से दूसरे सुख की उत्पत्ति की बात तो कही है, लेकिन इस सुख के जनक की अवहेलना की है। प्रत्येक सुख की उत्पत्ति के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। बेंथम इसका कारण बताने में असफल रहे हैं। अतः यह सिद्धांत तर्कसंगत नहीं है।

8) सभी सुख समान नहीं होते – बेंथम ने भौतिक सुख और मानसिक सुख को समान माना है। शरीर और आत्मा की अनुभूति के उद्देश्य और मात्रा आसमान होते हैं। बेंथम ने केवल मात्रा के आधार पर सुखों में अंतर मानकर मनुष्य को पशु स्तर तक गिरा दिया है। मैक्सी का कहना है “बेंथम की धारणा के अनुसार मनुष्य सूअर है।”

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