द्वंदात्मक भौतिकवाद

आलोचना –

1. भौतिक तत्व निर्णायक तत्व नहीं विश्व सभ्यता के विकास में मार्क्स भौतिकवादी तत्व अर्थात् पदार्थ को निर्णायक तत्व मानता है तथा यह प्रतिपादित करता है कि मानवीय चेतना उसी का परिणाम है। मानवीय चेतना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है , यह मानना उचित नहीं है। मनुष्य सिर्फ एक भौतिक प्राणी ही नहीं एक अतिरिक्त चेतनाशील प्राणी है।

मनुष्य पशु की तरह नहीं बल्कि मनुष्य की तरह जीना चाहता है और यह तभी संभव है जबकि वह भौतिकवाद को एक साधन और आत्मिक उत्थान को अपने जीवन का एक लक्ष्य मानकर उसकी उपलब्धि हेतु प्रयत्नशील हो। भौतिकवाद मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं करता है जो कि एक अनुचित धारणा है। पेट भर खाने पीने के बाद भी पशुओं में वह आत्मिक चेतना उत्पन्न नहीं होती जो मनुष्य में होती है। यह चेतन तत्व ही उसे पशु जगत से पृथक् कर मनुष्य होने का अनुभव कराता है। मार्क्स इस बात का अनुभव नहीं कर सका और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति को ही द्वंदवाद के माध्यम से मानव जीवन का लक्ष्य घोषित कर बैठा। मनुष्य की मनुष्य होने के नाते आत्मसंतुष्टि, भौतिक उत्थान से ही नहीं वरन् उसके माध्यम से आत्मिक उत्थान के लक्ष्य प्राप्त करके ही संभव है। भौतिकवाद इस दृष्टि से मनुष्य की बहुत अधिक सहायता नहीं करता है। यह उसके उत्थान की लक्ष्मण रेखा नहीं है।

2. एक समय विशेष में वाद, प्रतिवाद और संवाद का पता लगाना संभव नहीं मनुष्य समाज का विकास एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया का प्रतीक है। विभिन्न तत्व और क्रियाएं इस तरह आपस में घुली मिली होती हैं कि उनका वाद, प्रतिवाद और संवाद में विभाजित करना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव होता है। विरोध और विरोध में निहित अंतर्विरोध सामाजिक विकास को इतना जटिल बना देते हैं कि साधारण मनुष्य के लिए तो क्या बल्कि बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए भी उसकी दशा दिशा को ठीक प्रकार से समझ पाना और उसके अनुसार अपने आचरण को निर्धारित करना एक कठिन ही नहीं, असंभव सा कार्य है। दरअसल ये क्रियाएं अलग-अलग चरणों में सक्रिय होने के बजाय संभव रूप से चलती हैं तथा एक दूसरे की सीमा रेखाओं का अतिक्रमण करती रहती हैं। वाद प्रतिवाद और प्रतिवाद वाद हो सकता है ऐसी स्थिति में संवाद का पता लगाना एक उलझन भरा और भ्रमित करने वाला कार्य हो सकता है। अतः इस सिद्धांत के आधार पर सामाजिक विकास के सही रूप को समझना अपने आप में एक दुष्कर कार्य होगा।

3. आदर्श के उपलब्ध होने पर भी नियम निष्क्रिय नहीं होगा मार्क्स ने वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज की स्थापना पर तुलनात्मक नियम का निष्क्रिय होने का मत प्रतिपादित किया है, लेकिन ऐसा संभव नहीं होगा। पदार्थ को मार्क्स गतिशील और परिवर्तनशील प्रकृति का बताता है। उसमें निहित अंतर्विरोध उसे निरंतर आदर्श स्थिति में नहीं बने रहने देगा। यह नियम एक निरंतर सक्रिय रहने वाला नियम है। अतः आदर्श को यह शनै: शनै: पतनशील बनाकर गुणात्मक परिवर्तन के कारण आदर्श की स्थिति में ले जाएगा। आदर्श और अनादर्श का संघर्ष विश्व इतिहास का एक सनातन तथ्य है। मनुष्य की गतिशील सक्रियता मूर्ति निर्माण और मूर्ति-भंजक दोनों रही है। पुरानी मूर्तियों से असंतुष्ट होकर वह उनका विध्वंस और उनके स्थान पर नई मूर्तियां स्थापित कर रहा है। जो उसे एक समय आदर्श लगता है वही समय बीतने के साथ उसे अनादर्श लगने लगता है या लग सकता है। मनुष्य अपने सृजन से कभी भी संतुष्ट नहीं होता। वह नित्य नए प्रयोग करने का आदी रहा है। यह एक तरह से उसके स्वभाव का गुण है। अतः न पदार्थ और न उससे निर्मित मनुष्य कभी आदर्श स्थित पाकर शांत बैठेगा और न वह स्थिति अनवरत बनी रहेगी।

4. द्वंदवाद एक खतरनाक पद्धति मार्क्स ने आर्थिक नीतिवाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए यह बताया कि सामाजिक परिवर्तन में आर्थिक स्थितियां निर्णायक भूमिका का निर्वाह करती हैं। इसका सीधा साधा अर्थ यह हुआ कि मनुष्य में अपने विकास क्रम को बदलने की सामर्थ्य नहीं है। यदि हम मार्क्स की इस मान्यता को स्वीकार कर लेते हैं तो इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह होगा कि आर्थिक शक्तियों द्वारा समर्पित आदर्श के अतिरिक्त मनुष्य के अन्य सारे धार्मिक, नैतिक और आत्मिक आदर्श व्यर्थ हैं जबकि वास्तव की स्थिति ऐसी नहीं है। आर्थिक स्थितियों का सामाजिक परिवर्तन में महत्व स्वीकार करते हुए भी हम उनसे दिगर आदर्शों और मूल्यों के महत्व को स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकते। आर्थिक स्थितियों के बावजूद वह भी सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण शक्ति का निर्वाह करती हैं और कभी-कभी तो ऐसे परिवर्तन कर देती हैं जिनका आर्थिक स्थितियों से मेल बिठाना लगभग असंभव सा हो जाता है।

5. मानव इतिहास उत्थान का ही इतिहास नहीं है मार्क्स ने द्वंदवादी सिद्धांत के अनुसार यह बताया है कि विकास हमेशा ऊर्ध्वगामी होता है अर्थात् हमेशा यह मनुष्य समाज को प्रगति की दिशा में ले जाता है। यदि ऐसा होता तो आज मानव समाज की जैसी स्थिति है उससे उसकी स्थिति पूर्णतया भिन्न होती और उस आदर्श व्यवस्था अर्थात् वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज व्यवस्था की स्थापना कब की हो गई होती, जिसकी व्याख्या मार्क्स ने अपने चिंतन के माध्यम से की है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न तो मनुष्य समाज का विकास मार्क्स द्वारा प्रतिपादित तरीके से हुआ और न उसके वे परिणाम हुए जिनकी संभावना मार्क्स ने व्यक्त की थी। मानव जाति का इतिहास उत्थान और पतन दोनों का है। कभी स्थितियां समाज को उत्थान की ओर ले जाती हैं तो कभी पतन की ओर। मानव इतिहास उत्थान पतन का एक मिश्रित उदाहरण है, वह सिर्फ उत्थान की दास्तान ही नहीं है।

6. संघर्ष विकास का एकमात्र आधार नहीं द्वंदवाद के माध्यम से मार्क्स संघर्ष को विकास का एकमात्र आधार घोषित करता है। यह एक अर्ध सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं। संघर्ष और सहयोग स्थिति अनुसार दोनों ही विकास के साधन है तथा इन दोनों के माध्यम से ही मनुष्य अपने आदर्शों को प्राप्त करने का प्रयास करता है तथा अतीत में भी करता आया है।

मूल्यांकन मार्क्स द्वारा प्रतिपादित भौतिकवादी द्वंदात्मक सिद्धांत का उपर्युक्त आलोचनाओं के कारण उसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अपनी सारी कमियों और कमजोरियों के बावजूद वह हमें सामाजिक प्रगति के स्वरूप और विकास को समझने हेतु एक पैमाना प्रदान करता है। चाहे पैमाना एकांकी चरित्र का ही हो लेकिन एक पैमाना एक मापदंड तो है ही। फिर पूर्ण सत्य कोई वस्तु नहीं होती। सभी पैमाने चाहे वे आदर्शवादी हों या भौतिकवादी, अपूर्ण हैं लेकिन फिर भी अपना महत्व रखते हैं क्योंकि मनुष्य इन सभी पैमानों में समर्थ हो सकता है जो हमें आदर्श नहीं तो आदर्श के निकट अवश्य पहुंचा सकता है। हर पैमाने का यही महत्व है और इस दृष्टि से मार्क्स द्वारा प्रदत इस पैमाने का भी महत्व है। वह हमें देखने की एक दृष्टि देता है जिसका प्रयोग करके हम संपूर्ण को नहीं तो कम से कम उसके एक पक्ष को अवश्य देख सकते हैं।

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