Foreign policy of India (भारतीय विदेश नीति)

 

भारतीय विदेश नीति ( Foreign policy of India )

 

परिचय विदेश नीति एक निरंतर प्रक्रिया है जहां विभिन्न कारक भी विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग प्रकार से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। भारत की विदेश नीति का संबंध उसकी सभ्यता की परंपरा वह राजनीतिक स्थिति इसकी मिश्रित संस्कृति देश की सामूहिक अपचेतना और इसके साथ ही नेताओं की नीतियों और कार्यक्रमों से रहा है।

भारतीय सभ्यता में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिक्ख धर्म तथा अन्य सभी धर्मो जैसे कि इस्लाम और ईसाइयत के माध्यम से विश्व जगत को प्रभावित किया है। परंतु बाहरी संबंधों के सभी क्षेत्रों में भारतीय नेताओं के बीच उपनिवेशवाद में एक सामंजस्यहीन दृष्टिकोण में योग दिया है। अतः अब 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, तो भारत की विदेश नीति की प्रारंभिक अवस्था ने उपनिवेशवाद की कड़ी निंदा की। द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद शीत युद्ध के उदय से विश्व राजनीति का ध्रुवीकरण हो गया। उस समय भारत की विदेश नीति का प्रमुख उपकरण था, ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ जिसने भारत को बिना अपनी पहचान खोए एवं स्वतंत्र विदेश नीति के साथ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने और घरेलू विकास कार्यों पर ध्यान देने में समर्थ किया। इस प्रकार भारत उपनिवेशवाद के विरुद्ध खड़ा हो गया और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर रंगभेद की और समस्त विश्व का ध्यान आकर्षित किया। हालांकि अनेक लोगों को उत्तर शीत युद्ध काल में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता पर संदेह हुआ, परंतु भारतीय सरकार अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता के मूल्यों का निरंतर अनुसरण करती रही। समकालीन वर्षों में भारत प्रमुख रूप से अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के कारण वैश्विक मामलों में आकर्षण का केंद्र बन गया है। अतः 21 वीं शताब्दी में भारत को एक ऐसी विदेश नीति अपनाने की जरूरत है, जो उसे विकासशील देशों में एक उभरती हुई शक्ति और एक परमाणु संपन्न राज्य के रूप में वैश्विक व प्रादेशिक उत्तरदायित्व के निर्वाह में मदद कर सके।

अर्थ प्रत्येक देश की सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, अन्य राष्ट्रों से संबंध स्थापित करने व अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कुछ निश्चित उद्देश्य के आधार पर जो नीति निर्धारित करता है, वह उस देश की विदेश नीति कहलाती है।

 

भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्व

प्रायः सभी देशों की विदेश नीति स्थायी और गतिशील कारकों द्वारा निर्धारित होती है। स्थायी कारकों में भू राजनीतिक स्थिति, अनुभव व परंपराएं राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय आवश्यकताएं, आर्थिक तत्व सुरक्षा तथा गतिशील कारकों में अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां, घटनाएं, देश की आंतरिक स्थिति नेतृत्व, विदेश नीति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक की भूमिका निभाते हैं। भारत की विदेश नीति के भी यही स्थाई एवं गति से कारक निर्धारक तत्व है।

(1) भूगोल नेपोलियन बोनापार्ट का यह वाक्य महत्वपूर्ण है कि “किसी देश की विदेश नीति उसके भूगोल द्वारा निर्धारित होती है।” भारत के संबंध में यह तत्व पूर्णतया सत्य है। क्योंकि प्रकृति ने भारत को एशिया महाद्वीप के दक्षिण में हिंद महासागर पर अरब प्रायद्वीप और हिंद चीन प्रायद्वीप के मध्य केंद्रीय स्थिति प्रदान की है। इसकी सीमाएं सभी दक्षिण एशियाई देश तथा पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार एवं मालद्वीप से जुड़ी है। यह स्थिति सामरिक एवं व्यवहारिक स्थिति से महत्वपूर्ण है। इसकी उत्तर सीमा से रूस, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान नजदीक है। अतः भारत को दोनों साम्यवादी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना आवश्यक है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए सैनिक दृष्टि से अनुकूल है। अतः भारत का उत्तरी अमेरिका की पाकिस्तान भारतीय सैनिकों व आर्थिक प्रभाव को संतुलित रखने के साथ-साथ अमेरिका से विकास की दृष्टि से अच्छे संबंध बनाए रखना है।

(2) ऐतिहासिक अनुभव परंपराएं एवं संस्कृति आधारभूत रूप से किसी देश की विदेश नीति उसके तत्कालीन ऐतिहासिक अनुभवों, परंपराओं, और संस्कृति से निर्धारित होती है। भारत की विदेश नीति में इन अनुभवों और परंपराओं के साथ-साथ भारतीय दर्शन के अनुसार भारतीय परंपराओं में राजनीतिक शक्ति का एक आदर्शात्मक स्वरुप उजागर होता है, जिसमें शांति सहयोग और वसुधैव कुटुंबकम् रूपी अंतरराष्ट्रीय वाद का आदर्श रूप दिखाई पड़ता है। भारतीय संस्कृति साम्राज्यवाद और जातिवाद के घोर विरोधी ‘जियो और जीने दो’ के शांति के विचारों का समन्वित रूप विदेशनीति में विरासत के रुप में सम्मिलित है।

(3) राष्ट्रीय हित प्रत्येक देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती है। राष्ट्रीय हित में इन सभी बातों का योग होता है जो किसी राष्ट्र की संस्कृति, सुरक्षा और भौतिक कल्याण की अधिकतम गारंटी पर बल देता है। यह सत्य है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति सदा चलाएं मान रही है, उसमें कोई स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होते। यह सभी राष्ट्रीय हित को देखते हुए बनते और बिगड़ते रहते हैं। स्थायी तत्व के्वल राष्ट्रीय हित होता है, जिसके लिए ही विभिन्न प्रकार का राजनीतिक ताना-बाना बुना जाता है।

(4) राष्ट्रीय सुरक्षा प्रत्येक देश की विदेश नीति का लक्ष्य देश की सुरक्षा और विकास होता है। सैनिक दृष्टि से दुर्बल राष्ट्र भी अधिक समय तक अपनी स्वतंत्रता नहीं बनाए रख सकता है। भारत के संदर्भ में यह सत्य सटीक बैठता है। भारत के सैनिक दुर्बलता और राज्यों के बीच वैमनस्यता के कारण ही उसे मंगोलो, सिकंदर और अंग्रेजों की सैनिक शक्ति के सामने अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखना पड़ा था। स्वतंत्रता के बाद भी भारत सैनिक दृष्टि से सफल राष्ट्र नहीं था। इसीलिए भारत की विदेश नीति में सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने और अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए असंलग्नता की नीति को अपनाया है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शीत युद्ध के चलते नित्य बदलते राजनीतिक समीकरण और गुटबंदियों के चलते भारतीय विदेश नीति अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता, सुरक्षा के लिए समयानुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पुनः निर्धारण की प्रक्रिया अपनाती रहती है। जैसे पहले अमेरिका से संबंध बहुत खराब थे, किंतु अब मधुर संबंध बन गए हैं, और वह आण्विक सहयोग भी देने को तैयार है।

(5) आर्थिक विकास तत्व आधुनिक समय में राष्ट्रीय आर्थिक विकास तत्व राष्ट्रों के जीवन का महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। हर राष्ट्र की आंतरिक नीति अपनी क्षमता के आर्थिक जीवन स्तर को ऊंचा उठाते हुए उसके माध्यम से समृद्ध राष्ट्र बनाना रहता है। प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग उद्योग, उत्पादन, निर्यात पर है, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व तकनीकी सहयोग की आवश्यकता पड़ती है, ऐसी स्थिति में संपन्न और पूंजीवादी राष्ट्र इस तरह के सहयोग के बहाने देश की आंतरिक एवं विदेश नीति को प्रभावित करने हेतु सहायता के मुख्य द्वार खोलने को तैयार रहते हैं।

(6) अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सद्भाव को बढ़ावा भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं सदैव वसुधैव कुटुंबकम के भेद वाक्य को आधार बनाकर अपनी विदेश नीति को विश्व शांति सुरक्षा और सद्भाव को लक्ष्य लेकर चलती हैं। मार्च 1953 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यही कहा था कि “हम विश्व शांति के पक्षधर हैं और शांति की स्थापना के लिए यदि भारत कुछ कर सके तो उसी करने का हम भरसक प्रयत्न करते रहेंगे।” इस नीति के द्वारा भारत का सदैव यह प्रयास रहा है कि विश्व राष्ट्रों के मध्य ऐसी स्थितियों ना पैदा हो पाए जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव और शांति का वातावरण बने और सारा विश्व तनाव ग्रस्त हो जाये। इसीलिए भारत अपनी नीति में आचरण के पांच नैतिक सिद्धांत पंचशील को प्रमुख आधार बनाते हुए शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को अपनाने के लिए विश्व राष्ट्र का सम्मान करता आ रहा है। शांति और सद्भाव पर एक राष्ट्र के आर्थिक विकास के सपने को साकार कर सकेगा।

(7) आधुनिक तकनीकी प्रभाव हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं, जहां तकनीकी ज्ञान के निरंतर विकास ने हमारी सोच और गतिविधियों को प्रभावित कर दिया है। प्रत्येक राष्ट्र अपने आर्थिक विकास के लिए अत्याधुनिक तकनीक अपनाना चाहता है। अर्धविकसित और विकासशील राष्ट्र विश्व के विकसित देशों पर निर्भर होते जा रहे हैं। फलस्वरूप ऑटोमेटिक इलेक्ट्रिक पावर, रेडियो एक्टिव आइसोटोप, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, स्पीकर के आधुनिक उपकरण उपग्रह प्रणाली पर एकाधिकार रखने वाले देश इन जानकारियों को स्थानांतरण व प्रयोग की अनुमति के लिए शर्त रख कर अन्य विकसित और विकासशील देशों की विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं।

प्रचार और प्रसारण के माध्यम से व्यक्ति और समाज दोनों के चिंतन और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संबंध घटनाओं पर जनमत तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनके द्वारा किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का विश्लेषण राष्ट्रों के मध्य संबंधों को बिगाड़ था और सुधार का रहता है। आधा विदेश नीति के ऊपर इनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत की विदेश नीति किसी एक तत्व के प्रभाव के स्थान पर अनेक तत्वों के प्रभाव और योगदान से निर्मित होती रही है। कुछ विचारको ने इसे नेहरू नीति कह कर पुकारा है, जिसका स्वयं श्री नेहरू ने निराकरण करते हुए कहा था कि “भारत की विदेश नीति को नेहरू नीति कहना सर्वथा भ्रांतिपूर्ण है। यह कहना इसलिए गलत है कि मैंने केवल इस नीति का शब्दों में प्रतिपादन किया है, मैंने इसका अविष्कार नहीं किया, यह भारतीय परिस्थितियों की उपज है। वैयक्तिक रूप से मुझे यह विश्वास है कि भारत के वैशेषिक विषयों की बागडोर यदि किसी अन्य व्यक्ति या दल के हाथ में होता तो भी उसकी नीति वर्तमान नीति से भी नहीं होती।”

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