ऐतिहासिक भौतिकवाद

 

 

              content

  • परिचय
  • समाज विकास की छः अवस्थाओं का वर्णन
  • समाज की आर्थिक व्याख्या के निष्कर्ष
  • आलोचना

 परिचय इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत (theory of economic interpretation) अर्थात् ऐतिहासिक भौतिकवाद द्वंदात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत को सामाजिक विकास पर लागू करने का नाम है। इसका सीधा साधा अर्थ यह है कि इतिहास का निर्धारण अपने अंतिम रूप में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। अतः वे ही सामाजिक विकास की मुख्य निर्धारक तत्व होती हैं।

इसे स्पष्ट करते हुए अफनास्येव का कथन है कि “लोग भोजन, वस्त्र, आवास और जीवन की अन्य आवश्यकताओं के बिना नहीं रह सकते, पर प्रकृति यह सब उन्हें स्वयं बनाकर उनके हवाले नहीं करती। उन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य को श्रम करना पड़ता है। अतः श्रम सामाजिक जीवन का आधार है और मनुष्य के लिए एक प्राकृतिक आवश्यकता। श्रम और उत्पादन कार्य-कलाप बिना मानव जीवन ही असंभव हो जाएगा। अतः भौतिक संपदा का उत्पादन सामाजिक विकास का मुख्य निर्धारक तत्व है।”

दूसरे शब्दों में ऐतिहासिक भौतिकवाद की मुख्य विशेषता यह स्थापना है कि उत्पादन पद्धति सामाजिक विकास में मुख्य भूमिका का निर्वाह करती है। उत्पादन पद्धति से हमारा तात्पर्य उत्पादक शक्तियों और उत्पादन संबंधों के संपूर्ण योग से है। उत्पादन शक्तियों से तात्पर्य उत्पादन के दौरान मनुष्य-मनुष्य के मध्य स्थापित होते हैं। अतः एक उत्पादन पद्धति उत्पादक शक्तियों या साधनों और तद्नुसार स्थापित उत्पादन संबंधों के मध्य अटूट एकता का नाम है।

लेकिन उत्पादन पद्धति का रूप कभी स्थिर नहीं रहता। बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसका रूप निरंतर परिवर्तित और विकसित होता रहता है, तथा उसका स्थान उससे उच्चतर उत्पादन की पद्धति लेती रहती है तथा जैसे-जैसे उत्पादन पद्धति में विकास होता रहता है, उसी अनुपात में समाज के विकास का अर्थ भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। मार्क्स इस प्रकार यह सिद्ध करता है कि एक उत्पादन पद्धति के माध्यम से जो उत्पादन संबंध स्थापित होते हैं उनके योग से ही समाज की व्यवस्था का रूप विशेष निर्मित होता है। यही उत्पादन के संबंध उसकी नींव स्वरूप होते हैं तथा उसी के आधार पर उसकी वैज्ञानिक और राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण होता है और उसी के अनुरूप मनुष्यों की सामाजिक चेतना का स्वरूप निर्धारित होता है। इस आधार पर मार्क्स यह सिद्ध करता है कि मनुष्य का जीवन उनकी चेतना से निर्मित और निर्धारित नहीं होता वरन् उनके सामाजिक जीवन से उनकी चेतना निर्मित और निर्धारित होती है। अतः “सभी सामाजिक राजनीतिक तथा बौद्धिक संबंध सभी धार्मिक और वैधानिक पद्धतियां, सभी सैद्धांतिक दृष्टिकोण जो इतिहास के विकास क्रम में जन्म लेते हैं, वह सब जीवन की भौतिक आवश्यकताओं से उत्पन्न होते हैं।”

इस प्रकार मार्क्स उत्पादन पद्धति को सामाजिक व्यवस्था का मूलाधार सिद्ध करते हुए उस परिवर्तन प्रक्रिया का वर्णन करता है जो उत्पादन के साधनों में परिवर्तनों के साथ सामाजिक विकास की नई अवस्थाओं को जन्म देती है। मार्क्स इस आधार पर समाज विकास की छः अवस्थाओं का वर्णन करता है जो निम्नलिखित हैं-

1. आदिम साम्यवादी अवस्था समाज व्यवस्था का यह प्रारंभिक रूप थी। उत्पादन के साधन बहुत सरल और अनगढ़ अवस्था में थे, जो पत्थर और हड्डियों से निर्मित होते थे। उनका प्रयोग मुख्य रूप से शिकार करने और कंदमूल एकत्रित करने हेतु किया जाता था। अपने बलबूते पर व्यक्ति के लिए भोजन की व्यवस्था करना और जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करना संभव नहीं था। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उसे अपने अन्य साथियों के सहयोग की आवश्यकता थी। अतः इस आदिम समाज का स्वरूप सामूहिक था। उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होता था। मनुष्य समूह में रहकर ही संतुष्ट और सुरक्षित रहता था। उत्पादित माल पर उसका समान सामूहिक अधिकार रहता था। इस अवस्था में न किसी प्रकार की व्यक्तिगत संपत्ति थी और न व्यक्तिगत जीवन। यह एक शोषणविहीन अवस्था थी जो आदि से लगाकर अंत तक सामूहिक चरित्र की थी। मार्क्स ने इसी कारण इसे आदिम होते हुए भी साम्यवादी व्यवस्था के नाम से पुकारा है।

2. दास अवस्था धीरे-धीरे इस प्रारंभिक साम्यवादी व्यवस्था का पतन हो गया। पतन होने का प्रमुख कारण इसका विकसित होते हुए समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाना था। बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में उसकी आवश्यकता की पूर्ति हेतु यह व्यवस्था उत्पादन में वृद्धि करने में असमर्थ सिद्ध हो रही थी। अतः उत्पादन के साधनों में परिवर्तन अवश्यंभावी हो गया। इस दृष्टि से खेती-बाड़ी और दस्तकारी का उत्पादन के साधनों के रूप में उदय और प्रयोग प्रारंभ हुआ। समाज में शक्तिशाली लोगों ने सामूहिक जमीन पर व्यक्तिगत अधिकार कर लिया तथा दुर्बल लोगों को अपने अधिकार में ले कर उनका दासो की तरह प्रयोग करते हुए उनसे कृषि कार्य करवाने लगे। इस तरह सामूहिक से व्यक्तिगत उत्पादन के साधनों और व्यक्तिगत संपत्ति का प्रादुर्भाव हुआ। समाज दो भागों में विभाजित हो गया स्वामी और दास तथा स्वामी लोग अपनी व्यक्तिगत संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के कारण दासों के श्रम का शोषण करने लगे। इस प्रकार प्रारंभिक शोषण विहीन साम्यवादी व्यवस्था के स्थान पर दासों के शोषण पर आधारित एक नए समाज व्यवस्था की स्थापना हो गई, जिसमें सामूहिक संपत्ति और उत्पादन के साधनों का स्थान व्यक्तिगत संपत्ति और उत्पादन के साधनों में व्यक्तिगत स्वामित्व ने ले लिया। शोषण पर आधारित होने के कारण इसे मार्क्स द्वारा समाज की दास व्यवस्था के नाम से पुकारा गया।

3. सामंतवादी व्यवस्था जनसंख्या का अबाध गति से विस्तार होता रहा तथा जमीन पर मालिकाना हकों को लेकर भी समाज व्यवस्था में झगड़े बढ़ गए। मालिकों में इस हेतु आपसी संघर्ष होने लगा। मालिक अपने दासों का सैनिकों की तरह से अपने हितों की रक्षा करने हेतु प्रयोग करने लगे। धीरे-धीरे इस व्यवस्था ने विकसित होकर एक नई समाज व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे मार्क्स ने सामंतवादी व्यवस्था के नाम से पुकारा है। इस व्यवस्था में सारे जमीनों के मालिक सामंत बन गए तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान करने हेतु उनमें से सबसे शक्तिशाली सामंत उनका नेता अथवा राजा बन गया। उसने उन्हें निश्चित कर तथा सेवा प्रदान करने के बदले में उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन दिया। वे राजा के सामंत बन गए तथा उनके दास पूर्णतः कृषक के रूप में परिवर्तित हो गए। यद्यपि ये कृषक स्थिति की दृष्टि से दासों से कुछ भिन्न थे, लेकिन कम-ज्यादा उनकी स्थिति उनके समान ही थी। वे जिस भूमि पर कृषि कार्य करते थे, उसके स्वामी नहीं थे। स्वामी तो सामंत ही थे, लेकिन वे अपनी भूमि दासों में कृषि हेतु वितरित कर देते थे। फसलों पर सामंतों का अधिकार होता था और कृषको को उतना ही भाग मिलता था, जितने में वे अपना जीवन यापन कर सकें। उत्पादन से साधनों के हीन अर्थात् भूमि विहीन कृषक का उसी प्रकार शोषण होता था जिस तरह से दास का दास अवस्था में होता था। फलतः हितो के परस्पर विरोधी होने तथा कृसकों के सामंती शोषण के कारण इन दोनों वर्गों में संघर्ष इस अवस्था की भी एक स्थाई विशेषता थी, जिससे यह हर समय पीड़ित रहती थी।

4. पूंजीवादी अवस्था जनसंख्या में निरंतर वृद्धि के कारण बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति करने की दृष्टि से छोटे पैमाने पर उत्पादन करने वाली सामंतवादी व्यवस्था अप्रासंगिक सिद्ध होने लगी। फलतः बड़े पैमाने पर उत्पादन के लक्ष्य से 18 वीं शताब्दी के मध्य से औद्योगिक क्रांति प्रक्रिया प्रारंभ हुई। इसने सामंतवादी व्यवस्था को समाप्त करके उसके स्थान पर पूंजीवादी व्यवस्था की स्थापना की। आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज का कायापलट हो गया। समाज में दो नए वर्ग पैदा हो गए- पहला, उत्पादन के साधनों का स्वामी पूंजीपति वर्ग और दूसरा उत्पादन के साधनों के स्वामित्व से हीन अपनी जीविका उपार्जन के लिए अपना श्रम बेचने वाला श्रमिक वर्ग। यद्यपि श्रमिक दास, कृषक की तुलना में अपना श्रम बेचने की दृष्टि से स्वतंत्र था, लेकिन इस दृष्टि से उसे किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं थी। खुली और प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था के कारण मांग और पूर्ति के नियम के अनुसार पूंजीपति क्योंकि उत्पादन के साधनों के स्वामी थे, अतः अपनी इस लाभदायक स्थिति के कारण श्रमिक से श्रम वे अपनी शर्तों पर कराने में समर्थ थे। अतः मनुष्य द्वारा मनुष्य का नग्न शोषण इस अवस्था में भी दास तथा सामंतवादी व्यवस्था के समान ही जारी रहा। परिणामस्वरूप इस व्यवस्था ने श्रमिक असंतोष को जन्म दिया तथा पूंजीपतियों और श्रमिकों में वर्ग संघर्ष प्रारंभ हो गया। श्रमिक आंदोलनों के कारण समाज में अशांति और अराजकता का वातावरण उत्पन्न हो गया। मार्क्स बताता है कि श्रमिक आंदोलन से उत्पन्न वर्ग संघर्ष तीव्र होकर मात्रात्मक से गुणात्मक चरित्र में परिवर्तित हो जाता है जो समाज में श्रमिक वर्ग के नेतृत्व में क्रांति को जन्म देता है। यह क्रांति सफल होकर पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर देती है तथा एक नई समाज व्यवस्था की स्थापना करती है, जिसे मार्क्स समाजवादी व्यवस्था के नाम से पुकारता है। यह अवस्था श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व की व्यवस्था होती है। राजसत्ता पर श्रमिक वर्ग का नियंत्रण स्थापित हो जाता है और वह अपने नेतृत्व में समानता पर आधारित नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का कार्य प्रारंभ करता है।

5. समाजवादी अवस्था श्रमिक क्रांति के पश्चात् श्रमिक वर्ग के नेतृत्व में इस व्यवस्था को स्थापित करने का अभियान प्रारंभ होता है। इस व्यवस्था में राज व्यवस्था का स्वरूप श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्त्व का होता है, जो नई समता प्रधान समाजवादी व्यवस्था की स्थापना हेतु पूंजीवादी व्यवस्था के बचे कुचे अवशेषों को नष्ट करने का कार्य करता है। वह उत्पादन के साधनों पर से पूंजीवादी व्यक्तिगत स्वामित्व को समाप्त कर उन पर सामाजिक स्वामित्व को कायम करता है और उनके माध्यम से उत्पादन का उद्देश्य लाभ कमाने के स्थान पर सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति अर्थात् सामाजिक सेवा करना घोषित करता है। हर क्षेत्र में सामाजिक समानता की स्थापना तथा व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के शोषण का उन्मूलन इसका प्रमुख उद्देश्य होता है। इसमें हर एक श्रमिक को अपने श्रम का उचित पारिश्रमिक प्राप्त होता है। इस व्यवस्था का बुनियादी सिद्धांत होता है हर एक द्वारा अपनी योग्यता के अनुसार काम तथा उस काम के बदले में उसका पूरा भुगतान। इस तरह पूंजीवादी लाभ आधारित शोषक व्यवस्था की शोषण प्रवृत्ति का पूर्णतया उन्मूलन और एक शोषण मुक्त समानता आधारित समाज की स्थापना इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य होता है जिसके अनुसार यह कार्य करती है जिसे मार्क्स समाज व्यवस्था का अंतिम आदर्श रूप घोषित करता है।

6. साम्यवादी अवस्था समाजवादी व्यवस्था के निर्माण का उद्देश्य एक ऐसे पूर्णतः स्वतंत्र और समानता आधारित राज्य की स्थापना करना है, जिसमें न वर्ग होंगे और न वर्ग आधारित शोषण का नामोनिशान। यह अवस्था इस कारण एक पूर्ण शोषणमुक्त, वर्ग विहीन, राज्य विहीन व्यवस्था होगी। मार्क्स राज्य को एक वर्ग संगठन मानता है। अतः जब समाज से वर्गों का उन्मूलन हो जाएगा तो वर्ग की प्रतिनिधि संस्था राज्य का भी उन्मूलन हो जाएगा। इस कारण यह अवस्था अपने आदर्श रूप में एक वर्गविहीन व्यवस्था होने के कारण राज्यविहीन भी होगी। इस अवस्था में हर व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता और समानता एक प्रमुख विशेषता होगी। व्यक्ति का इतना आदर्श विकास हो जाएगा कि उसे सामाजिक अनुशासन का पालन करने हेतु बाध्यकारी राज्य व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं होगी। वह स्वेच्छा से ही सभी समाज हितकारी कायदे कानूनों का पालन करेगा और उस व्यवस्था के एक सम्मानित सदस्य के रूप में जीवन यापन करने में असमर्थ होगा। इस व्यवस्था में उत्पादन और वितरण का मूल नियम होगा “प्रत्येक अपनी योग्यता के अनुसार कार्य करे और अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करे।”

 

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