ऐतिहासिक भौतिकवाद

समाज की आर्थिक व्याख्या के निष्कर्ष मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाज की जो आर्थिक व्याख्या की गई है उसे निष्कर्ष रूप में हम इस तरह से प्रस्तुत कर सकते हैं:

1. सामाजिक परिवर्तन और विकास संबंधी धारणाओं या विचारों का परिणाम नहीं है वरन् उसके निश्चित वैज्ञानिक नियम है। अतः वह उन्हीं के अनुसार अपनी यात्रा करता है और लक्ष्य पर पहुंचता है।

2. हर युग की सामाजिक व्यवस्था पर उसी वर्ग का आधिपत्य होता है जिसका उत्पादन के साधनों पर आधिपत्य होता है।

3. विभिन्न सामाजिक संस्थाएं उत्पादन के साधनों और संबंधों पर निर्भर करती हैं। उनमें परिवर्तन हो जाने पर उसका पतन और उसके स्थान पर उससे अधिक संपन्न व्यवस्था ले लेती है। उत्पादन व्यवस्था के अनुसार ही सामाजिक व्यवस्था के राजनीतिक संवैधानिक तथा अन्य सभी स्वरूप निर्धारित होते हैं।

4. वर्ग संघर्ष मानवीय इतिहास और विकास का मूल आधार है। साम्यवादी व्यवस्था को छोड़कर समाज की अन्य सारी व्यवस्थाओं के परिवर्तन में यह महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। साम्यवादी व्यवस्था में क्योंकि वर्ग समाप्त हो जाते हैं अतः वर्ग संघर्ष का भी उन्मूलन हो जाता है। वर्ग संघर्ष क्रांतिकारी परिवर्तनों का कारक है।

5. मार्क्स इतिहास की आर्थिक व्याख्या के माध्यम से ही वर्ग संघर्ष आधारित क्रांति के द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था का उन्मूलन और अंतः आदर्श वर्ग-विहीन, राज्य-विहीन साम्यवादी समाज व्यवस्था की संभावना की घोषणा करता है।

आलोचना मार्क्स द्वारा प्रतिपादित इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत की विभिन्न आधारों पर आलोचना की जाती है जो निम्नानुसार है:

1. आर्थिक तत्व पर आवश्यकता से अधिक बल – मार्क्स का इतिहास की आधी व्याख्या का सिद्धांत एकपक्षीय है। वह अन्य तत्वों जैसे – राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक की तुलना में आर्थिक तत्व को सामाजिक परिवर्तन और विकास की दृष्टि से आवश्यकता से अधिक महत्वपूर्ण घोषित करता है। यह बात सही है कि आर्थिक तत्व सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है लेकिन वह उसके लिए एकमात्र उत्तरदायी तत्व नहीं है। चाहे सीमित दृष्टि से ही हो आर्थिक तत्व के अतिरिक्त अन्य तत्वों भी सामाजिक विकास में अपना योगदान देते हैं। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक द्वारा अहिंसा का वरण और बौद्ध धर्म को अभिकरण किया जाना किसी आर्थिक कारण से नहीं वरन् कलिंग युद्ध में हुई हिंसा के कारण था। आधुनिक युग में राष्ट्रवाद का विकास भी आर्थिक कारणों से इतना तीव्र गति से नहीं हुआ जितना कि राष्ट्राभिमान की धारणा से।

2. क्रांति संबंधी अवधारणा का इतिहास से मेल नहीं – मार्क्स ने आर्थिक व्याख्या के आधार पर क्रांति की अवधारणा को प्रतिपादित करते हुए मत प्रकट किया कि “कोई सामाजिक व्यवस्था तब तक विलुप्त नहीं होती, जबकि उत्पादन के तत्व जिनके लिए उसके भीतर गुंजाइश होती है, पूर्णतया विकसित नहीं हो जाते तथा उत्पादन के नए उच्चतर संबंध तब तक प्रकट नहीं होते जब तक कि पुराने समाज की कोख में ही उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक भौतिक परिस्थितियां परिपक्व नहीं हो जाती।”

दूसरे शब्दों में मार्क्स के कहने का तात्पर्य यह है कि पुरानी उत्पादन व्यवस्था तब तक विलुप्त नहीं होती जब तक कि वह नई उत्पादन व्यवस्था की उत्पत्ति के लिए स्वयं उसकी भूमिका तैयार नहीं कर देती अर्थात पूंजीवाद के परिपक्व होने पर ही समाजवादी क्रांति के होने की अपेक्षा की जा सकती है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे बात की परिपक्वता की दृष्टि से क्रांति सर्वप्रथम ब्रिटेन में होनी चाहिए लेकिन महत्वहीन होकर मुझे बात की दृष्टि से एक पिछड़े हुए देश रूस में हुई। साम्यवादी चीन भी इसी तरह का एक उदाहरण है जहां मांओं के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति एक कृषि प्रधान चीन में हुई। आरती की व्याख्या की दृष्टि से ऐसा नहीं होना चाहिए था लेकिन रूस और चीन दोनों देशों में क्रांति के माध्यम से समाजवाद सीधा पूंजीवाद को उल्लांघ कर सामंतवाद के बाद आ गया। अतः मार्क्स का इतिहास की आर्थिक व्याख्या के आधार पर प्रतिपादित क्रांति का सिद्धांत इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

3. राजनीतिक सत्ता सदैव आर्थिक सत्ता से ही उत्पन्न नहीं होती – मार्क्स की यह धारणा की राजनीतिक सत्ता सदैव ही आर्थिक सत्ता का परिणाम है। तर्क की कसौटी पर भी यह धारणा उपर्युक्त नहीं है। कई बार ऐसा देखने में आया है कि मनुष्य अपने व्यक्तिगत अहम् के वशीभूत होकर उसकी पुष्टि के लिए सत्ता पर अधिकार कर लेता है। नेपोलियन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। उसने अपने वैयक्तिक अहम् को संतुष्ट करने के लिए सैन्य शक्ति के माध्यम से फ्रांस की सत्ता पर अधिकार कर लिया। विश्व की अधिकांश अधिनायकवादी व्यवस्थाएं आर्थिक कारण से नहीं वरन् वैयक्तिक अहम् की ही उत्पत्ति से अभिव्यक्त होती हैं।

4. सामाजिक विकास का काल विभाजन असंभव – मार्क्स ने अपने आर्थिक व्यवस्था के सिद्धांत के आधार पर समाज के विकास का जो काल विभाजन किया है तथा उसके आधार पर जो उसकी स्पष्ट विभिन्न अवस्थाएं निर्धारित की हैं, यह संभव नहीं है। आदिम साम्यवादी अवस्था, दास अवस्था, सामंती अवस्था, पूंजीवादी अवस्था आदि यह समाज की ऐसी अवस्थाएं रही हैं जिन्हें समझने के लिए हम वैसा उसका नामकरण कर सकते हैं अन्यथा गहराई पर देखने पर हमें एक अवस्था में दूसरे अवस्था के लक्षण भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। जैसे वर्तमान समय में पूंजीवादी व्यवस्था में समाजवादी व्यवस्था के तथा समाजवादी व्यवस्था में पूंजीवादी व्यवस्था के लक्षण निहित दिखाई देते हैं। पूंजीवादी राष्ट्र सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से समाजवाद का और साम्यवादी राष्ट्र आर्थिक विकास हेतु पूंजीवादी मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। अतः हम समाज के लिए चाहे उन्हें समाजवादी या पूंजीवादी कहलें लेकिन वे विशुद्ध रूप से वैसी व्यवस्थाएं नहीं हैं।

5. यह सिद्धांत अंतर्विरोध से पीड़ित है – मार्क्स ने इस सिद्धांत के माध्यम से आर्थिक नियतिवाद (economic determinism) का प्रतिपादन किया अर्थात् आर्थिक तत्व समाज के विकास में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करते हैं तथा दूसरी तरफ व श्रमिकों का आव्हान भी करता है कि वह संग्रहित होकर अपनी वर्ग चेतना के आधार पर वर्ग संघर्ष के माध्यम से क्रांति करके पूंजीवाद का अंत कर दें। यदि आर्थिक नियतिवाद सही है तो पूंजीवाद परिपक्व होने पर स्वत नष्ट हो जाएगा उसके अंत के लिए श्रमिकों के आव्हान करने की आवश्यकता कहां और क्यों है। दोनों में से एक चीज सही और दूसरी गलत हो सकती है। दोनों चीजें एक साथ सही नहीं हो सकती। यह अंतर विरोधी इस सिद्धांत की सत्यता और उपयोगिता के प्रति शंका उत्पन्न करता है।

6. आर्थिक व्यवस्था राजनीतिक सत्ता द्वारा बदली जा सकती है – मानव इतिहास में ऐसे भी घटनाएं हुई हैं जबकि राजनीतिक सत्ता ने आर्थिक व्यवस्था के स्वरूप को परिवर्तित कर दिया या उसे गहरे रूप से प्रभावित किया, जिससे उसमें मौलिक परिवर्तन हो गए। राज्य द्वारा औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन में अपनाई गई अहस्तक्षेप की नीति (laissez-faire) इसका प्रमाण है। दूसरे आर्थिक व्यवस्था का यद्यपि अविषम लेकिन अकल्पनीय विकास हुआ। राज्य की तरफ से व्यक्ति को जो स्वतंत्रता प्रदान की गई उस स्वतंत्रता के कारण वहां कल-कारखानों का ही आशातीत विकास नहीं हुआ वरन् उत्पादन की नई-नई व्यक्तिगत तकनीकों का भी अविष्कार हुआ, जिससे उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई और उसे बढ़े हुए उत्पादन को खपाने के लिए नए बाजार ढूंढने हेतु ब्रिटेन ने एक ऐसा साम्राज्य स्थापित किया, जिसमें किसी समय सूर्य अस्त नहीं होता था। ब्रिटेन की समृद्धि और सत्ता इतनी सुदृढ़ हो गई थी कि यह लहरों पर यानी पृथ्वी पर ही नहीं समुद्र पर भी शासन करने लगा। इस तरह राजनीतिक सत्ता ने आर्थिक सत्ता का रूप ही परिवर्तित कर दिया।

7. आदर्श प्राप्ति पर भी परिवर्तनशीलता रुकेगी नहीं – इतिहास की आर्थिक व्याख्या के माध्यम से सामाजिक विकास पर उसका वर्ग-विहीन, राज्य विहीन आदर्श रूप स्थापित होने के बाद पदार्थ की गतिशीलता का नियम उसके सभी अंतर्द्वंदों से मुक्त होने के कारण मार्क्स के अनुसार कार्य करना बंद कर देगा। समाज की यह एक स्थिर स्थिति होगी। मार्क्स एक तरफ पदार्थ की जन्मजात गतिशीलता तथा परिवर्तनशीलता की बात करता है तथा दूसरी तरफ आदर्श स्थिति की प्राप्ति के पश्चात् वह उसे इस नियम से मुक्त कर देता है। यह उसकी एक असंगत मान्यता है। पदार्थ यदि गतिशील है तो वह आदर्श रूप प्राप्त करने के बाद भी कार्य करता रहेगा।अतः आदर्श के बाद उसके अनादर्श स्वरूप का प्रारंभ हो जाएगा तथा वह फिर उसी परिवर्तन के चक्र से होकर अपनी विकास यात्रा पर चल पड़ेगा, लेकिन मार्क्स ऐसी संभावना से इनकार करता है और आदर्श रूप की स्थिरता की मान्यता का समर्थन करता है। यह मान्यता भी मार्क्स के चिंतन की वैज्ञानिकता के सम्मुख एक प्रश्नवाचक चिन्ह लगाती है और यह सिद्ध करती है कि मार्क्स का चिंतन वैज्ञानिक कम और उद्देश्यमूलक अधिक है।

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