मैकियावेली अपने युग का शिशु

 

मैकियावेली अपने युग का शिशु के रूप में 

सामान्यतः प्रत्येक दार्शनिक एवं विद्वान अपने युग का शिशु होता है क्योंकि उसके चिंतन पर समकालीन परिस्थितियों, घटनाओं एवं प्रचलित विचारधाराओं का प्रभाव पड़ता ही है और वह अपने देश और काल के रंग में रंगा होता है, परंतु फिर भी राजनीतिक विचारों के इतिहास में मैकियावेली को ही ‘अपने युग का शिशु’ की संज्ञा दी जाती है। वह न केवल अपनी समकालीन परिस्थितियों से विशेषतः प्रभावित हुआ, बल्कि उसने परिस्थितियों के दोषों को स्पष्ट किया और उसके समाधान भी सुझाए। उसकी प्रत्येक विचार अथवा सिद्धांत में हमें इटली की तत्कालीन परिस्थितियों की झलक मिलती है।

मैकियावेली का युग पुनर्जागरण का था और इस कारण उसे पुनर्जागरण का प्रतिनिधि भी कहा जाता है। मैकियावेली अपने युग से जितना प्रभावित हुआ उतना बहुत ही कम लेखक अपने युग से प्रभावित होते हैं। उसे छोड़कर शायद ही कोई ऐसा दूसरा राजनीतिक विचारक हुआ हो, जिसने अपना संपूर्ण लेखन कार्य समकालीन परिस्थितियों के आधार पर किया हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि वह भिन्न परिस्थितियों में रहता तो उसके विचार भी भिन्न होते और यह भी सच है कि यदि मैकियावेली इटली में 15वीं शताब्दी में पैदा न होता तो उसे राजदर्शन के इतिहास में वह स्थान न प्राप्त होता जो उसे आज प्राप्त है।

वे तत्व जिन्होंने मैकियावेली पर सबसे गहरा प्रभाव डाला, उसके राजनीतिक दर्शन का मार्गदर्शन किया और जिनके प्रभाव से वह अपने युग का शिशु कहलाया, निम्नलिखित हैं-

1) पुनर्जागरण आंदोलन : मैकियावेली का जन्म ज्ञान और बुद्धि के पुनरोदय के काल में हुआ और उसकी रचनाओं में पुनर्जागरण की आत्मा स्पष्ट रूप से झलकती है। मैकियावेली का नगर फ्लोरेंस पुनर्जागरण आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। इस आंदोलन के द्वारा दी गई प्रेरणा के परिणामस्वरूप राजनीतिक क्षेत्र में सामंतवाद का अंत होकर राष्ट्रीय राज्य की स्थापना होने लगे तथा राजनीतिक क्षेत्र में धर्म और नैतिकता, चर्च और बाइबिलवाद के प्रभाव समाप्त होने लगे। पोप की मध्यकालीन निरंकुश धार्मिक सत्ता तथा नैतिकता से लोगों का विश्वास उठ गया था और उसका स्थान बुद्धि, विवेक तथा तार्किकता ने ग्रहण कर लिया। इस काल में व्यापार, छापा खाने की कला तथा यातायात के साधनों के विकास ने नए जीवन, नई चेतना, नए दृष्टिकोण, स्वतंत्रता की नई भावना और जीवन के नवीन मूल्यों को जन्म दिया था।

इस तरह पुनर्जागरण आंदोलन की मुख्य विशेषता यह थी कि वह मध्य युग के प्रभाव से पूर्णतः मुक्ति के उद्देश से प्रेरित था। फ्लोरेंसवासी होने के कारण मैकियावेली पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप उसने मध्ययुगीन धार्मिक और नैतिक मान्यताओं से मुक्त होकर प्राचीन इतिहास के अपने अध्ययन के आधार पर राजनीति के क्षेत्र में सर्वथा नवीन विचारों का प्रतिपादन किया।

2) शक्तिशाली निरंकुश राजतंत्र की स्थापना : पुनर्जागरण काल भारी राजनीतिक परिवर्तनों का काल था। जब मैकियावेली का आविर्भाव हुआ तो परिषदीय आंदोलन समाप्त हो चुका था। शक्तिशाली शासकों ने सामंतों व उनकी प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं का दमन कर निरंकुश राजतंत्र स्थापित कर लिए थे। पश्चिमी यूरोप के अलावा सभी राज्यों में सामंतों के हाथ से शक्तियां छीनकर राजाओं के हाथों में केंद्रित हो गई थी।

इंग्लैंड, फ्रांस और स्पेन में निरंकुश राजतंत्रों की स्थापना हो चुकी थी। यह राज्य सबल शासकों के नेतृत्व में दिन-प्रतिदिन शक्तिशाली हो रहे थे। अतः मैकियावेली ने इटली के लिए ऐसे शासन की स्थापना की कल्पना किया, जिसमें इटली की समस्त राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण हो तथा जो इटली में एकता स्थापित कर सबल राजतंत्र की स्थापना कर सके।

इसे भी पढ़े: मैकियावेली के विधि और विधि निर्माता संबंधी विचार

3) इटली का राजनीतिक विभाजन और उसकी दुर्दशा : इस समय तक जहां पश्चिमी यूरोप के राज्य जैसे- इंग्लैंड, फ्रांस तथा स्पेन में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी और इन राष्ट्रों के निवासियों ने स्वयं में एकता की भावना अपना ली थी। वही इन शक्तिशाली राज्यों की तुलना में इटली पांच राज्यों (नेपल्स,मिलान, फ्लोरेंस,वेनिस गणराज्य,रोमन चर्च का क्षेत्र) में बंटा हुआ था तथा ये राज्य परस्पर संघर्षरत थे। इटली के इस राजनीति विभाजन और राज्यों के पारस्परिक संघर्ष ने देश को बड़ा दुर्बल बना दिया था और वह आसानी से शक्तिशाली पड़ोसियों की महत्वकांक्षाओं का शिकार बनने लगा।

मैकियावेली एक सच्चा देशभक्त था और इस संबंध में उसे फ्रांस का प्रत्यक्ष अनुभव था। अतः वह फ्रांस की भांति एक शक्तिशाली राष्ट्रीय राजा की अध्यक्षता में इन राज्यों का एकीकरण करना चाहता था ताकि एक तरफ तो देश की अराजक व अशांति स्थिति पर काबू पाया जा सके और दूसरी ओर विदेशी आक्रमण से देश की रक्षा हो सके। इसी उद्देश्य से उसने प्रिंस की रचना की।

4) इटलीवासियों की दुर्दशा : मैकियावेली के समय इटालियन समाज की दशा बड़ी सोचनीय थी। तत्कालीन इटलीवासियों में इमानदारी और देशभक्ति का अभाव था। भ्रष्टाचार, दलबंदी और स्वार्थपरता ने उन्हें जकड़ रखा था। यद्यपि प्रतिभा से परिपूर्ण व्यक्तियों की कमी नहीं थी, किंतु नैतिक दृष्टि से उनका पतन हो चुका था। स्वयं पोप का चरित्र अपवित्रता की सीमा लांघने लग गया था। साधारण नागरिक पैसा लेकर अनुचित काम भी करने को तैयार हो जाते थे।

इस सामाजिक दुर्दशा का मैकियावेली पर गंभीर प्रभाव पड़ा। देश के एकीकरण के लिए वह शक्ति का पुजारी बन गया और उसने राष्ट्रीय सेना की स्थापना को आवश्यक बताया। उसने गणतंत्रीय शासन प्रणाली की सिफारिश न करते हुए इटलीवासियों के लिए एक निरंकुश राजा की आवश्यकता महसूस की। उसने व्यावहारिक राजनीति को स्थान देते हुए यह मत व्यक्त किया कि राजा का एकमात्र उद्देश्य देश को सफल बनाना और उसे संगठित रखना है। अपने इस महान और पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजा उचित अनुचित सभी प्रकार के साधन अपना सकता है।

5) धर्म और नैतिकता : 14वीं सदी में पोप के विश्व साम्राज्य का स्वप्न नष्ट हो चुका था। पोप के विलासमय जीवन एवं कुकर्मों ने लोगों के हृदय में धर्म के प्रति विश्वास एवं श्रद्धा समाप्त कर दिया था। उसी समय सेवानोराला जैसे संत ने चर्च के सुधार की मांग की तथा नैतिक बल से आध्यात्मिक पथ प्रदर्शन का प्रयत्न किया। उसकी शिक्षाओं का लोगों पर प्रभाव भी पड़ा, किंतु जब फ्रांस ने फ्लोरेंस पर अधिकार कर लिया तो पोप को प्रसन्न करने के लिए संत सेवानोराला को बंदी बना लिया गया तथा उसे जिंदा जला दिया गया। राजाओं ने नैतिक आदर्शों को तिलांजलि दे दी और साधारण नागरिक भी नैतिक नियमों के अनुसार आचरण नहीं करते थे।

मैकियावेली पर अपने युग की परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार ही उसने नरेश को सलाह दी कि राज्य के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए धर्म और नैतिकता के सिद्धांतों की चिंता नहीं की जानी चाहिए और लोक कल्याण के लिए इन सिद्धांतों की अवहेलना करने को तत्पर रहना चाहिए।

इसे भी पढ़े: धर्म और नैतिकता पर मैकियावेली के विचार

6) मानव स्वभाव संबंधी धारणा : मैकियावेली ने अपने समय में विशेषतः इटली में शासक, धर्माधिकारी, सरकारी कर्मचारी और साधारण नागरिक सभी को भ्रष्ट आचरण में लिप्त देखा था। शासक और पोप के संघर्षों, पोप के षड़यंत्रों और साधारण नागरिकों के पतित तथा स्वार्थी आचरण ने उस पर मानव स्वभाव की बहुत बुरी छाप छोड़ी और उसने यह विचार व्यक्त किया कि न तो मनुष्य में ईश्वरीय गुण है और न वह नैतिक प्राणी है। वह एक जानवर है और जानवरों की चालांकी तथा खूंखार प्रवृत्ति ही उसमें दिखाई देती है।

इसे भी पढ़े: मैकियावेली की मानव स्वभाव संबंधी विचार

इस प्रकार स्पष्ट है कि मैकियावेली का चिंतन उसके युग में विद्यमान परिस्थितियों से बहुत गहरे रूप से प्रभावित था। इसलिए डनिंग द्वारा उसे ‘युग का शिशु’ (child of his times) की संज्ञा दी गई है। फिर भी कतिपय आलोचकों का कहना है कि मैकियावेली ने अपनी समकालीन परिस्थितियों की आवश्यकतानुसार कुछ सिद्धांत पहले से ही निश्चित कर लिये और फिर उनको पुष्ट करने के लिए इतिहास से खोज खोज कर उदाहरण दिये। वस्तुतः मैकियावेली ने अपने अनुभव के आधार पर निकाले के निष्कर्षों को ऐतिहासिक उदाहरण से पुस्ट किया है।

x
Scroll to Top