मैकियावेली के विधि और विधि निर्माता संबंधी विचार

विधि के संबंध में मैकियावेली के विचार अत्यंत ही संकुचित हैं। वह मध्यकालीन विचारकों की तरह प्राकृतिक अथवा दैवीय विधियों में विश्वास नहीं करता है। वह केवल नागरिक विधियों की कल्पना करता है, जो शासक के द्वारा बनायी जाती है। उसके अनुसार राज्य की स्थापना के पूर्व कोई कानून अथवा व्यवस्था का अस्तित्व नहीं था। नागरिक विधियों द्वारा ही प्राकृतिक अराजक व्यवस्था का अंत हुआ एवं समाज को एकता के सूत्र में बांधा गया है। मैकियावेली के अनुसार विधि का स्त्रोत शासन ही है और इस प्रकार उसकी विधि संबंधी धारणा संकुचित, किंतु निश्चित रूप से अधिक यथार्थवादी है।

मैकियावेली का दूसरा सामान्य सिद्धांत जिस पर उसने बार-बार बल दिया है, वह यह है कि समाज में कानून निर्माता का सबसे अधिक महत्व रहता है। उसका विश्वास है कि एक नवीन राज्य की स्थापना में एक बुद्धिमान विधि निर्माता की अत्यंत आवश्यकता होती है, चाहे वह एक व्यक्ति हो या संस्था। उसके द्वारा निर्मित नियम नागरिकों के जीवन को नियमित कर, उसमें नैतिक गुणों का विकास और राष्ट्रीय चरित्र का उत्थान करते हैं। समाज का उद्धार एक बुद्धिमान विधि निर्माता द्वारा ही हो सकता है। विधियां राजनीतिक ढांचे को ही निर्धारित नहीं करता वरन् संपूर्ण सामाजिक एवं नैतिक, आर्थिक ढांचे को भी प्रभावित करती है।

शासक के कर्तव्य अथवा आचरण के सिद्धांत : प्रिंस के 18वें अध्याय में मैकियावेली ने उन सिद्धांतों का उल्लेख किया है, जिनके आधार पर राजा को अपना आचरण करना चाहिए। इस विषय में उसकी शिक्षाएं निम्नलिखित हैं-

1) अधिकाधिक शक्ति का अर्जन : मैकियावेली ‘शक्ति ही सत्य है’ (might is right) में विश्वास करता है और शक्ति मैकियावेली की समस्त राजनीतिक विचारधारा का केंद्रीय तत्व है। अतः मैकियावेली अपने शासक को अधिकाधिक शक्ति प्राप्त करने उसे बनाए रखने और उसका विस्तार करने के लिए निर्देश देता है। इस संबंध में मैं केवली का विचार है कि शासक का मूल कर्तव्य बाहरी आक्रमण से सुरक्षा और आंतरिक क्षेत्र में शांति तथा व्यवस्था बनाए रखना है और यह कार्य शक्ति के आधार पर ही संभव है।

2) साम, दाम, दंड और भेद को अपनाना : मैकियावेली के द्वारा अपने प्रिंस को साम, दाम, दंड और भेद का आवश्यकतानुसार प्रयोग करने का निर्देश दिया गया है। राजा को जनता के सामने सभ्य गुणों का प्रदर्शन करना चाहिए, जिससे लोग समझे कि राजा बहुत गुणी है परंतु उसे सद्गुणों का दास नहीं हो जाना चाहिए। राजा के द्वारा अपने राज्य के नागरिकों और अन्य राज्यों के शासकों को जो वचन दिए गए हैं उनका महत्व है, लेकिन उनका पालन तभी तक किया जाना चाहिए जब तक ऐसा करना राज्य के हित में हो।

3) शेर और लोमड़ी के गुणों को धारण करना : मैकियावेली के अनुसार राजा में शेर और लोमड़ी दोनों के ही गुण होने चाहिए। शेर अपने को जाल में फंसने से नहीं बचा पाता और लोमड़ी भेड़ियों से अपनी रक्षा नहीं कर पाती। अतः कहा जाता है कि इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसमें लोमड़ी की चाल भी होनी चाहिए और भेड़ियों को डराने के लिए उसमें शेर की तरह शक्ति भी होनी चाहिए। लेकिन अपने लोमड़ी के स्वरूप को छुपाए रखने के लिए राजा को उच्च कोटि का बहरूपिया होना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर अपने वचन भंग करने के लिए लोमड़ी की चाल से काम लेना चाहिए।

4) क्रूरता का एक साथ प्रदर्शन : मैकियावेली के अनुसार जब प्रिंस किसी राज्य पर अधिकार कर लेता है, तो विजेता को सभी अत्याचार व क्रूरता एक साथ कर लेना चाहिए। यह क्रूरताओं का सदुपयोग है। राज्य की प्राप्ति के लिए बड़े से बड़ा विश्वासघात किया जाना चाहिए, बशर्ते कि ऐसा विश्वासघात बार-बार न किया जाए क्योंकि बार-बार ऐसा करना क्रूरता का दुरुपयोग है।

5) राष्ट्रीय सेना का गठन : नरेश को राज्य की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली राष्ट्रीय सेना का गठन करना चाहिए। उसे किराए की सेना पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए।

6) कानूनों का कठोरता पूर्वक पालन : कानूनों का पालन नितांत आवश्यक है, अतः राजा के द्वारा सामाजिक मामलों में किसी प्रकार की निर्मलता नहीं दिखाई जानी चाहिए। कठोरतम दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे कानून भंग करने वालों को सदैव ही भय बना रहे।

7) सैनिक शक्ति का विस्तार और युद्ध की स्थिति बनाये रखना : मैकियावेली की मान्यता है कि सैनिक शक्ति का विस्तार किया जाना चाहिए और युद्ध की स्थिति को बनाए रखा जाना चाहिए। राज्य का हमेशा विस्तार किया जाना चाहिए। ‘विस्तार करो या नष्ट हो जाओ’ की कहावत सत्य ही है। ग्रीक नगर राज्य स्थायी होने के कारण ही नष्ट हुए। युद्ध की स्थिति से न केवल सैनिकों में वरन् साधारण नागरिकों में भी अनुशासन, देशभक्ति, एकता और कठोर जीवन की आदत का विकास होता है।

8) आचरण भय मुक्त हो लेकिन घृणित नहीं : राजा को ऐसा होना चाहिए कि लोग उससे प्रेम भी करें और भयभीत भी रहें, लेकिन यदि ये दोनों गुण एक साथ ही उसमें न हो और एक को छोड़ना ही पड़े तो यह अधिक अच्छा होगा कि लोग उसे प्रेम करने की बजाय उससे डरें। प्रेम तभी तक रहता है जब तक स्वार्थ होता है। लेकिन भय दंड के द्वारा उत्पन्न किया जाता है इसलिए उसका प्रभाव स्थाई होता है। अतः डर प्रेम करने की अपेक्षा अधिक प्रभावी है।

9) सम्मान पूर्ण आचरण : प्रत्येक राजा को दयालु होते हुए भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई उसकी क्षमाशीलता का लाभ न उठाए। राजा को सदैव कीर्ति प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह प्रजा की घृणा का पात्र न हो। इससे बचने के लिए उसे अपने राज्य के नागरिकों की संपत्ति नहीं छीनना चाहिए, स्त्रियों का हरण नहीं करना चाहिए। इन दोनों कार्यों के न होने पर अधिकांश जनता सुखी और संतुष्ट रहती है।

10) व्यापार और वाणिज्य का विकास : शासक को स्वयं व्यापार और वाणिज्य संबंधित कार्य नहीं करना चाहिए, किंतु उसे राज्य में इनके विकास में सहायता अवश्य करनी चाहिए। जब राज्य में कृषि, व्यापार व वाणिज्य का विकास नहीं होता है तो निर्धनता आती है और उसके दुष्परिणाम शासक को भोगने पड़ते हैं। अतः उसे इन वर्गों के व्यक्तियों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

11) मितव्ययिता व उदारता : एक अच्छे राजा को मितव्ययी होना चाहिए। राज्य के धन को भोग-विलास पर और अनाप-शनाप खर्च नहीं करना चाहिए। लड़ाई में प्राप्त लूट के माल का कुछ हिस्सा उदारतापूर्वक जनता और सैनिकों में बांटना चाहिए। ऐसा करने से राजा को यश व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

12) चापलूसों से दूर रहना : राजा को अपने सलाहकार और मंत्रियों के चयन में सावधान रहना चाहिए। शासक को सदैव चापलूसों से बच कर रहना चाहिए। चापलूस लोग राज्य और राजा के लिए कोई भी संकट उत्पन्न कर सकते हैं।

13) कला और साहित्य में रुचि : राजा को साहित्य और संगीत का संरक्षक, कलाकारों का सम्मान करने वाला, गुण ग्राहक होना चाहिए।

14) निपुणता और योग्यता को प्रोत्साहन : निपुणता और योग्यता को प्रोत्साहित करने के लिए राजा के द्वारा पुरस्कार, उपाधियां और पद प्रदान किए जाने चाहिए। पुरस्कार, उपाधियां और पद प्रदान करने के कार्य राजा के द्वारा स्वयं किए जाने चाहिए, ताकि वह जनता में अधिक लोकप्रिय हो। राजा को दंड आदि के अप्रिय कार्यों का पालन अपने अफसरों द्वारा कराना चाहिए, क्योंकि इनके कारण होने वाली बदनामी उन अफसरों के सिर पर पड़ेगी और यदि इनमें कुछ पीछे हटना पड़ा तो वह दोष अफसरों के सिर पर मढ़कर आसानी से बच सकता है।

15) शक्ति संतुलन बनाए रखना : मैकियावेली के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राजा की नीति शक्ति संतुलन बनाए रखने की होनी चाहिए। उसे हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने पड़ोसी राज्यों को आपस में संधि में न बंधने दें। उसे पड़ोसी राज्यों के आंतरिक मामलों में निरंतर हस्तक्षेप की नीति अपनानी चाहिए और पड़ोसी राज्यों को प्रलोभन अथवा शक्ति बल द्वारा अपना मित्र बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

मैकियावेली ने राजा को नैतिक-अनैतिक, उचित-अनुचित, धार्मिक-अधार्मिक सभी उपायों के प्रयोग की अनुमति देते हुए इस बात पर बल दिया है कि राजा का अंतिम उद्देश्य राज्य की प्रगति एवं समृद्धि है तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति में प्रयुक्त किए जाने वाले सभी उपाय व साधन न्यायसंगत एवं सम्माननीय हैं।

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