लोक प्रशासन : अर्थ, प्रकृति, क्षेत्र

 

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  •   परिचय,अर्थ,परिभाषाएं 
  •   प्रकृति
  •   लोक प्रशासन का क्षेत्र
  •   लोक प्रशासन का विकास

1) परिचय – ‘लोक प्रशासन’ प्रशासन की एक अधिक व्यापक अवधारणा का ही एक पहलू है। इसलिए लोक प्रशासन का अर्थ समझने से पहले यह आवश्यक है कि हम प्रशासन शब्द का अर्थ समझे। अंग्रेजी शब्द administer (प्रशासन करना) दो शब्दों ad और minister के मेल से बना है, जिनका अर्थ है सेवा करना या प्रबंधन करना। प्रशासन का शाब्दिक अर्थ है सार्वजनिक मामलों का प्रबंधन।

2) अर्थ – लोक प्रशासन शब्द दो अर्थों में प्रयोग किया जाता है – विस्तृत अर्थ और संकीर्ण अर्थ। विस्तृत अर्थ में लोक प्रशासन में सरकार की 3 शाखाओं विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका की गतिविधियां शामिल होती हैं। इस दृष्टिकोण को वुड्रो विल्सन, एल.डी. व्हाइट, फिफनर आदि ने अपनाया है। इसके विपरीत संकीर्ण अर्थ में लोक प्रशासन में सरकार की सिर्फ कार्यकारी शाखा की गतिविधियां ही शामिल होती है। इस दृष्टिकोण को साइमन, लूथर गुलिक, विलोबी आदि ने अपनाया है।

 

3) परिभाषाएं 

वुड्रो विल्सन – “लोक प्रशासन का काम कानून को सविस्तार व्यवस्थित रूप से लागू करना है। कानून लागू करने की प्रत्येक कार्यवाही प्रशासन की ही एक गतिविधि है।”

एल.डी. व्हाइट – “लोक प्रशासन में वे सभी गतिविधियां शामिल हैं, जिनका उद्देश्य लोकनीति की पूर्ति करना या उसे लागू करना है।”

लूथर गुलिक – “लोक प्रशासन, प्रशासन के विज्ञान का वह हिस्सा है, जिसका सरोकार सरकार और इस तरह कार्यकारी शाखा से होता है जहां सरकार के काम होते हैं, हालांकि प्रत्यक्षत: विधिक और न्यायिक शाखाओं के साथ इसके संबंध में समस्याएं हैं।”

साइमन – “आमतौर पर लोक प्रशासन का अर्थ है राष्ट्रीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों की कार्यकारी शाखाओं की गतिविधियां।”

 

4) प्रकृति 

लोक प्रशासन के विद्वानों ने लोक प्रशासन की प्रकृति को दो अलग-अलग दृष्टिकोण से व्यक्त किया है -समग्र दृष्टिकोण और प्रबंधकीय दृष्टिकोण।

1. समग्र दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोण के अनुसार, लोक प्रशासन उन सभी गतिविधियों का समावेश करता है, जो दिए गए लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। दूसरे शब्दों में, लोक प्रशासन प्रबंधकीय, तकनीकी लिपिक-संबंधी और दस्ती कामों का कुल योग है। इस प्रकार इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रशासन ऊपर से नीचे तक सभी व्यक्तियों की गतिविधियों से बनता है।

2. प्रबंधकीय दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोण के अनुसार लोक प्रशासन में केवल प्रबंधकीय गतिविधियां शामिल होती हैं। तकनीकी, लिपिक संबंधी और दस्ती इसमें शामिल नहीं होती, जो स्वभाव से ही गैर प्रबंधकीय गतिविधियां हैं। अतः इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रशासन सिर्फ ऊपर के व्यक्तियों की गतिविधियों से बनता है।

 

5) लोक प्रशासन का क्षेत्र

एक अध्ययन विषय के क्षेत्र का अभिप्राय है कि उस विषय के अधिकार क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य या क्रियाएं सम्मिलित की जाती हैं। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि लोक प्रशासन का क्षेत्र राज्य तथा सरकार के क्षेत्र के समरूप है किन्तु यदि हम सूक्ष्म रूप से विचार करें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि लोक प्रशासन का क्षेत्र अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो पाया है क्योंकि कुछ मूलभूत प्रश्नों का सर्वमान्य हल खोजा जा रहा है, फिर भी इस अध्ययन विषय के क्षेत्र को समझने में निम्नांकित दृष्टिकोण लाभदायक हो सकते हैं:

1) संकुचित दृष्टिकोण : संकुचित विचार (Narrow view) के मानने वालों के अनुसार लोक प्रशासन का सम्बन्ध शासन की केवल कार्यपालिका शाखा (Executive Branch) से है। साइमन ने कहा है कि लोक प्रशासन से अभिप्राय उन क्रियाओं से है जो केन्द्र, राज्य तथा स्थानीय सरकारों की कार्यपालिका शाखाओं द्वारा सम्पादित की जाती है। लूथर गुलिक द्वारा प्रस्तुत “पोस्डकार्ब” विचार को भी इसी संकुचित दायरे में रखा जा सकता है।

2) व्यापक दृष्टिकोण : व्यापक दृष्टिकोण के समर्थक यह मानते हैं कि लोक प्रशासन के अन्तर्गत सरकार के तीनों अंगों-व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका द्वारा सम्पादित कार्य शामिल हैं। इनके अनुसार लोक प्रशासन के क्षेत्र में वे सभी क्रियाकलाप सम्मिलित हैं जिनका प्रयोजन लोक-नीति को पूरा करना या उसे क्रियान्वित करना होता है। विलोबी, मार्क्स और एल० डी० व्हाइट इस विचार के समर्थक हैं। मार्क्स के शब्दों में, “अपने व्यापकतम क्षेत्र में लोक प्रशासन के अन्तर्गत सार्वजनिक नीति से सम्बन्धित समस्त क्रियाएँ आती हैं।”

3) पोस्डकोर्ब दृष्टिकोण : प्रशासनिक सिद्धांत एवं विचार लोक प्रशासन के कार्य-क्षेत्र के सम्बन्ध में POSDCORB विचार लूथर गुलिक (Luther Gullick) की देन है। “POSDCORB” शब्द अंग्रेजी के सात शब्दों के प्रथम अक्षरों को मिलाकर बनाया गया है इन शब्दों का विस्तृतत अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि POSDCORB द्वारा निष्पादित कार्य मोटे तौर पर मुख्य कार्यपालिका द्वारा निष्पादित कार्य से काफी मिलता-जुलता है।

1. योजना बनाना (Planning): बिना योजना के लक्ष्य प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इच्छित कार्यों की रूपरेखा तैयार करना और निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रीतियों एवं नीतियों का निर्धारण इसके अन्तर्गत किया जाता है।

2. संगठन बनाना (Organising): प्रशासकीय ढाँचे को इस प्रकार संगठित किया जाये कि कार्यों का विभाजन उचित ढंग से हो सके। प्रशासकीय चार्ट, संगठन के सिद्धान्त एवं कार्यों का बँटवारा इन तीनों के बीच सन्तुलन बनाये रखना संगठन का एक प्रमुख कार्य है।

3. कर्मचारियों की व्यवस्था करना (Staffing): कर्मचारियों के माध्यम से ही लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। कर्मचारियों की भर्ती, चयन प्रशिक्षण, पदोन्नति एवं कार्य करने की अनुकूल दशाओं का निर्माण करना इसके अन्तर्गत शामिल है।

4. निर्देशन प्रदान करना (Directing): लोक प्रशासन का कार्य प्रशासन सम्बन्धी कार्यों का विश्लेषण करके निर्णय लेना और निर्णय के अनुसार कर्मचारियों को निर्देश देना है। उचित निर्देशन के अभाव में प्रशासन अपने लक्ष्यों से भटक जायेगा।

5. समन्वय स्थापित करना (Co-ordinating): प्रशासकीय कार्यों के सम्पादन में समन्वय एक आवश्यक तत्व है। कार्यों का विभाजन कर उचित कार्य उचित व्यक्ति को देना और उसमें तालमेल बैठाना या समन्वय करना एक बहुत बड़ी समस्या है। समन्वय के द्वारा कार्यों के दोहराव को भी रोका जाता है।

6. प्रतिवेदन देना (Reporting): इसका अर्थ है प्रशासकीय कार्यों की प्रगति से सम्बन्धित सूचनाएँ उन लोगों को प्रदान करना जिनके प्रति संगठन उत्तरदायी है। प्रशासन की उपलब्धियों, कमियों तथा समस्याओं के निरीक्षण के सम्बन्ध में प्रतिवेदन देकर ही हम प्रशासन को उत्तरदायी बना सकते हैं।

7. बजट तैयार करना (Budgeting): प्रशासन के लिए वित्त ही प्राण है। बिना समुचित वित्त की व्यवस्था के लोक प्रशासन शिथिल हो जायेगा। आय-व्यय का लेखा-जोखा तैयार करना, वित्तीय योजनाओं का निर्माण करना, करारोपण, व्यय करना और अंकेक्षण के माध्यम से नियन्त्रण रखना इसके अन्तर्गत शामिल हैं।

POSDCORB की उपर्युक्त क्रियाएँ लोक प्रशासन के सभी संगठनों में पायी जाती हैं। प्रशासन के किसी भी क्षेत्र में ये प्रशासनिक क्रियाएँ समान रूप से काम में आती हैं। ये प्रबन्ध सम्बन्धी सामान्य समस्याएँ हैं जो प्रत्येक अभिकरण में पायी जाती हैं। अतः यह कहना उपर्युक्त होगा कि मोटे रूप से लोक प्रशासन के कार्यक्षेत्र को ही POSDCORB के सूत्र में पिरोया गया है।

4) लोक नीति सम्बन्धी दृष्टिकोण : यद्यपि व्हाईट द्वारा दी गई परिभाषा के अन्तर्गत लोक प्रशासन, लोक नीतियों (Public Policies) के क्रियान्वयन से सम्बन्धित माना जाता रहा है, किन्तु विगत कुछ दशकों से यह कहा जा रहा है कि लोक प्रशासन केवल सरकारी नीतियों के व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए ही उत्तरदायी नहीं है बल्कि नीति के निर्माण में भी इसकी अहम भूमिका है। सामान्यतः यही माना जाता है कि लोक नीति का निर्माण सर्वोच्च राजनीतिक कार्यपालिका तथा विधायिका करती है तथा लोक प्रशासन के अधिकारी एवं संस्थाएँ राजनीतिज्ञों द्वारा निर्मित लोक नीति को लागू करते हैं किन्तु लोक प्रशासन को नीति विज्ञान मानने वाले यह तर्क देते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में लोक नीति वैसी ही निर्मित होती है जैसा कि प्रारूप प्रशासनिक अधिकारी तैयार करके देते हैं या तथ्य तथा आँकड़े उपलब्ध करवाकर अपनी भूमिका निभाते हैं। दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि लोक नीति तो एक स्थूल विचार है जबकि इस नीति का क्रियान्वयन वास्तव में वैसा ही होता है जैसे कि कार्यक्रम तथा योजनाएँ प्रशासन बनाता है। लोक प्रशासन में भी अधिकांश स्तरों पर नीतियाँ तैयार होती है। वैसे भी नीति विज्ञानी यह मानते हैं कि राजनीति विज्ञान तथा लोक प्रशासन का क्षेत्र मिलता-जुलता है। इनके मध्य दूरी या विभाजक रेखा खींचना हितकर नहीं है।

5) मनोसामाजिक दृष्टिकोण : फ्रेड रिग्ज, फरेल हैडी एवं स्टॉक्स तथा रॉबर्ट डहल इत्यादि प्रगतिशील विद्वान यह मानते हैं कि लोक प्रशासन निर्वात (शून्य) में कार्य नहीं करता है बल्कि यह तो सम्पूर्ण मानव समाज का अनिवार्य अंग है, अतः लोक प्रशासन का क्षेत्र केवल कुछ प्रबंधकीय तकनीकें नहीं बल्कि मानव समाज की सभ्यता, संस्कृति, मूल्य, परिस्थितियाँ, अर्थव्यवस्था तथा मानव-व्यवहार इत्यादि भी इसके अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

तुलनात्मक लोक प्रशासन तथा सिद्धान्त निर्माण को एक दूसरे का पर्याय मानने का कारण यही है कि ऐसा लोक प्रशासन को एक सैद्धान्तिक विषय के रूप में स्थापित करने के लिए यह नितांत आवश्यक है। रॉबर्ट डहल का मानना है- “जब तक लोक प्रशासन का अध्ययन तुलनात्मक नहीं बनाया जाता, तब तक लोक प्रशासन को विज्ञान मानने का दावा खोखला ही बना रहेगा।” इस प्रकार यह दृष्टिकोण, पारिस्थितिकीय उपागम का समर्थक है जो न केवल सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक कारकों से लोक प्रशासन के अध्ययनों में सम्मिलित करता है बल्कि अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ अन्तर्विषयी दृष्टिकोण पर भी बल प्रदान करता है। वास्तव में, लोक प्रशासन के क्षेत्र में सभी सामाजिक विज्ञानों का क्षेत्र तो सम्मिलित नहीं किया जा सकता है बल्कि लोक प्रशासन के अध्ययनों में कुछ सामाजिक पक्षों को समाहित करना एक सीमा तक अनिवार्य-सा है।

6) लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन द्विविभाजन दृष्टिकोण : लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन में कुछ आधारभूत समानताएँ भी हैं तो कुछ स्पष्ट अंतर भी हैं। हेनरी फेयोल, मेरी पारकर फॉलेट तथा उरविक लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन में भेद (पार्थक्य) नहीं स्वीकारते हैं। फेयोल के अनुसार प्रशासन का जो अर्थ मैंने बताया है, वह प्रशासनिक विज्ञान के क्षेत्र को बहुत विस्तृत बना देता है।” अर्थात् लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन की कार्यप्रणाली, नियम तथा क्षेत्र एक समान हैं लेकिन बरसों से यह माना जाता रहा है कि लाभ, उद्देश्य, व्यापकता, दायित्व तथा लोकहित के आधारों पर लोक एवं निजी प्रशासन में व्यापक अंतर विद्यमान है। निःसंदेह एक बनिए की दुकान तथा सरकारी कार्यालय एक समान नहीं हो सकते हैं लेकिन लोक उपक्रमों के माध्यम से सरकार ने भी उन्हीं क्रियाओं को अपना लिया है जो एक निजी कम्पनी अपनाती है। दूसरी ओर, किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सामाजिक विकास के दायित्व सरकार उठाती है, अतः सरकार कुछ कानून तथा नीतियों को इस प्रकार की बना देती है कि वे सरकारी संगठनों तथा निजी संगठनों पर एक समान लागू होती हैं। बढ़ते वैश्वीकरण, निजीकरण, उदारीकरण तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति ने लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन के अन्तर को कम किया है। लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन के इसी द्विविभाजन ने इसके क्षेत्र का रेखांकन अस्पष्ट बनाया हुआ है।

 

लोक प्रशासन का विकास

लोक प्रशासन एक अभिनव सामाजिक विज्ञान है, जिसने अभी अपने 100 वर्ष भी पूरे नहीं किए हैं। एक युवा और विकासशील सामाजिक विज्ञान होने के बावजूद इसका जीवन उतार-चढ़ाव और उथल-पुथल से परिपूर्ण रहा है। लोक प्रशासन का इतिहास निम्नलिखित पांच चरणों में विभाजित है –

1) प्रथम चरण (1887 – 1926)
एक विषय के रूप में लोक प्रशासन का जन्म 1887 में, अमेरिका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राजनीति के तत्कालीन प्राध्यापक वुड्रो विल्सन को इस शास्त्र का जनक माना जाता है। उन्होंने 1887 में प्रकाशित अपने लेख ‘प्रशासन का अध्ययन’ (the study of administration) में राजनीति और प्रशासन को अलग अलग बताते हुए कहा “एक संविधान का निर्माण सरल है पर इसे चलाना बड़ा कठिन है।” उन्होंने इस ‘चलाने’ क्षेत्र के अध्ययन पर बल दिया जो स्पष्टत: ‘प्रशासन’ ही है। सन 18 सो 87 में विल्सन के लेख के प्रकाशन के साथ वास्तव में एक ऐसे नए युग का जन्म हुआ, जिसमें धीरे-धीरे लोक प्रशासन अध्ययन के एक नए क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ। यह उल्लेखनीय है कि अन्य देशों की तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका में लोक प्रशासन के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाने लगा।

इस विषय के एक अन्य महत्वपूर्ण प्रणेता फ्रैंक गुड़नाउ है, जिन्होंने 1900 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘राजनीति तथा प्रशासन’ में यह तर्क प्रस्तुत किया कि राजनीति और प्रशासन अलग अलग है क्योंकि जहां राजनीति राज्य इच्छा को प्रतिपादित करती है, वहीं प्रशासन का संबंध इस इच्छा या राज्य नीतियों के क्रियान्वयन से है। सन् 1926 में एल.डी. व्हाइट की पुस्तक ‘लोक प्रशासन के अध्ययन की भूमिका’ (introduction of the study of the public administration) प्रकाशित हुई। यह लोग प्रशासन की प्रथम पाठ्य पुस्तक थी, जिसमें राजनीति प्रशासन का मुख्य लक्ष्य दक्षता और मित्रता है।

लोक प्रशासन के विकास के इस प्रथम चरण की दो प्रमुख विशेषताएं रहीं – लोक प्रशासन का उदय और राजनीति एवं प्रशासन के अलगाव में विश्वास।

2) द्वितीय चरण (1927-1937)
लोक प्रशासन के इतिहास में द्वितीय चरण का प्रारंभ हम डब्ल्यू.एफ.विलोबी की पुस्तक ‘लोक प्रशासन के सिद्धांत’ (principles of public administration) से मान सकते हैं। विलोबी ने यह प्रतिपादित किया कि लोक प्रशासन में अनेक सिद्धांत हैं, जिनको क्रियान्वित करने से लोक प्रशासन को सुधारा जा सकता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्हाइट और विलोबी के दोनों प्रवर्तक ग्रंथों ने लगभग एक पीढ़ी तक लोक प्रशासन संबंधी पाठ्य पुस्तकों के प्रणयन और उसके अध्ययन की पद्धति का निर्धारण किया। इन दोनों ही पुस्तकों का रूप तकनीकी है, जिनमें उन सभी प्रकार की सामान्य समस्याओं का अध्ययन किया गया है, जिन्हें ‘पोस्डकार्ब’ शब्द में समाहित किया जा सकता है। यह दोनों ही प्रवर्तक ग्रंथ इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोक प्रशासन को राजनीति से पृथक और स्वतंत्र होना चाहिए तथा इसके सिद्धांतों को मोटे तौर पर सहज ही पहचाना और परिभाषित किया जा सकता है।

विलोबी की उपरोक्त पुस्तक के बाद अनेक विद्वानों ने लोक प्रशासन पर पुस्तकें लिखनी शुरू कीं, जिनमें कुछ उल्लेखनीय नाम हैं – मैरी पार्कर फोलेट, हेनरी फेयोल, मूने, रियेले आदि। 1937 में लूथर गुलिक तथा उर्विक ने मिलकर लोक प्रशासन पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक का संपादन किया जिसका नाम है ‘प्रशासन विज्ञान पर निबंध’ (papers on the science of administration) । द्वितीय चरण के इन सभी विद्वानों की यह मान्यता रही कि प्रशासन में सिद्धांत होने के कारण यह एक विज्ञान है और इसलिए इसके आगे लोक शब्द लगाना उचित नहीं है। सिद्धांत तो सभी जगह लागू होते हैं चाहे वह लोग क्षेत्र हो या निजी क्षेत्र।

3) तृतीय चरण (1938-1947)
अब प्रशासन में सिद्धांतों को चुनौती देने का युग प्रारंभ हुआ। सन् 1938 से 1947 तक का चरण लोक प्रशासन के क्षेत्र में विध्वंशकारी अधिक रहा। सन् 1938 में चेस्टर बर्नार्ड की ‘कार्यपालिका के कार्य’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें प्रशासन के किसी भी सिद्धांत का वर्णन नहीं किया गया। सन् 1946 में हार्वर्ड ने अपने एक लेख में लोक प्रशासन के तथाकथित सिद्धांतों को नकारते हुए उन्हें मुहावरों की संज्ञा दी। लगभग एक साल बाद ही साइमन की पुस्तक ‘प्रशासकीय व्यवहार’ (administrative behaviour) प्रकाशित हुई। यह सिद्ध किया गया कि प्रशासन में सिद्धांत नाम की कोई चीज नहीं है।

इस तृतीय चरण की प्रधानता यही रही कि लोक प्रशासन का अध्ययन चुनौतियों और आलोचनाओं का शिकार बना, जिससे इस विषय के विकास की नई संभावनाएं उजागर हुई।

4) चतुर्थ चरण (1948-1970)
यह चरण इस रूप मे क्रांतिकारी अथवा संकट काल का रहा कि लोक प्रशासन जिन जिन उपलब्धियों का गीत गा रहा था, उन सभी को बेकार ठहरा दिया गया। हर्बर्ट साइमन ने जो युक्तिसंगत आलोचना की, उसके फलस्वरुप सिद्धांतवादी विचारधारा अविश्वसनीय प्रतीत होने लगी। इसलिए 1948 से 1970 के चरण को लोक प्रशासन के स्वरूप की संकट अवस्था कहा गया है। इस युग में लोक प्रशासन ने मोटे तौर पर दो रास्ते अपनाए- प्रथम, कुछ विद्वान राजनीति शास्त्र के अंतर्गत आये। द्वितीय, लोक प्रशासन के विकल्प की खोज हुई। जो विद्वान राजनीति शास्त्र के अंतर्गत आये उनका तर्क था कि लोक प्रशासन राजनीति से निकला है और उसका अंग है। स्वभाविक था कि इस स्थिति में लोक प्रशासन सौतेलेपन और अकेलेपन का अनुभव करने लगा। लोक प्रशासन के लिए विकल्प की खोज हुई, वह था – ‘प्रशासनिक विज्ञान’। लोक प्रशासन, व्यापार प्रबंध आदि ने मिलकर प्रशासनिक विज्ञान की नींव डाली। यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रशासन तो प्रशासन ही है चाहे वह निजी क्षेत्र में हो या सार्वजनिक क्षेत्र में। 1956 में administrative science quarterly नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। वास्तव में यह बहुत अखरने वाली बात थी कि लोक प्रशासन के अपने ‘निजी स्वरूप’ को आघात पहुंचे।

5) पांचवा चरण (1970 से अब तक)
चतुर्थ चरण की आलोचनाओं प्रत्यालोचनाओं और चुनौतियों ने कुल मिलाकर लोक प्रशासन का भला किया। लोक प्रशासन का अध्ययन बहुचर्चित हो गया, नये नये दृष्टिकोण विकसित हुए और फलस्वरुप लोक प्रशासन बहुमुखी प्रगति के मार्ग पर बढ़ने लगा। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विभिन्न शास्त्रों के विद्वान और इसके अध्ययन में रुचि ले रहे थे। इन विभिन्न अध्ययनों और प्रयत्नों के फलस्वरुप लोक प्रशासन ‘अंतर्विषयी’ बन गया और आज यह एक तथ्य है कि समाजशास्त्रों में यदि कोई विषय सबसे अधिक ‘अंतर्विषयी’ है तो वह लोक प्रशासन ही है। इससे लोक प्रशासन के वैज्ञानिक स्वरूप का विकास हुआ। इतना ही नहीं इससे लोक प्रशासन के क्षेत्र का विस्तार होता गया और तुलनात्मक लोक प्रशासन तथा विकास प्रशासन का प्रादुर्भाव हुआ। परंपरागत दृष्टिकोण की अपर्याप्तता, अनुसंधान के नये उपकरणों और नवीन धाराओं के उदय, नवीन सामाजिक संदर्भ, अंतरराष्ट्रीय निर्भरता आदि ने तुलनात्मक लोक प्रशासन को जन्म दिया और उसे आगे बढ़ाया। लोक प्रशासन के तुलनात्मक अध्ययन के परिणामों और प्रविधियों का पूरे लोक प्रशासन के स्वरूप पर गंभीर प्रभाव पड़ा। यह तथ्य उत्साहपूर्ण और हर्षवर्धक है कि लोक प्रशासन में आज पश्चिमी देशों का ही अध्ययन नहीं होता है, वरन् साम्यवादी तथा अमेरिकी और एशिया के देश भी इसकी परिधि में आ गये हैं। वर्तमान में विश्व के अनेक महत्वपूर्ण और ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालयों में इस विषय का अध्ययन किया जा रहा है। अनेक महत्वपूर्ण शोध पत्रिकायें भी प्रकाशित हो रही हैं। इस प्रकार से वर्त

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