संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना , उद्देश्य, सिद्धान्त

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की विभीषिका तथा उसकी विनाश-लीला से त्रस्त होकर विश्व के प्रमुख राष्ट्रों ने भावी महायुद्ध की सम्भावना को कम करने के लिये, पारस्परिक सुरक्षा, शान्ति एवं कल्याण को दृष्टि में रखते हुए एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता का अनुभव किया और उसे क्रियात्मक रूप देने के लिये 1920 में राष्ट्रसंघ (लीग ऑफ नेशन्स) की स्थापना की। किन्तु कई कारणों से राष्ट्र संघ राजनीतिक क्षेत्र में पूर्णतया सफल नहीं रहा और इसके रहते ही 1939 में द्वितीय महायुद्ध का आरंभ हो गया और राष्ट्र संघ का काम ठप पड़ गया। इसके पश्चात् मानव जाति को युद्ध की महाविपत्ति से बचाने तथा विश्व शान्ति की स्थापना के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने जो स्वरूप ग्रहण किया, उसमें निम्नलिखित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

 

(1) अटलान्टिक चार्टर

14 अगस्त, 1941 को राष्ट्रपति रूजवेल्ट तथा प्रधान मन्त्री चर्चिल ने एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये थे जो अटलान्टिक चार्टर के नाम से विख्यात है। अटलान्टिक चार्टर का उल्लेख प्रायः संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्माता के रूप में किया जाता है। इस चार्टर में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का सिद्धान्त, आक्रमण का विरोध, नि:शस्त्रीकरण, व्यापार और कच्चे माल के प्रति समान पहुँच आदि प्रावधान थे।

 

(2) संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा

अटलान्टिक चार्टर की घोषणा के पश्चात् ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा की गयी थी जिस पर 26 राष्ट्रो ने 1 जनवरी, 1942 को हस्ताक्षर किये थे। इस घोषणा मेंअटलान्टिक चार्टर के सिद्धान्तों का समर्थन किया गया था और उसमें प्रत्येक राष्ट्र ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वह अपने सम्पूर्ण साधनों को शत्रु के विरुद्ध लगायेगा।

 

(3) मास्को सम्मेलन

1943 के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के परराष्ट्र मंत्रियों तथा रूस में चीन के राजदूत ने अपनी सरकारों की ओर से यह वचन दिया था कि शान्ति और सुरक्षा को बनाये रखने के लिये उनका संयुक्त प्रयास जारी रहेगा तथा उन्होंने घोषणा की थी कि वे शीघ्र से शीघ्र एक सामान्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना को स्वीकार करते हैं, जो सभी शान्तिप्रिय राष्ट्रों की समानता के सिद्धान्त पर आधारित हो तथा जिसकी सदस्यता छोटे और बड़े सभी राज्यों के लिये खुली हो।

 

(4) ड़म्बरटन ओक्स सम्मेलन

1944 में ड़म्बरटन ओक्स (वाशिंगटन) में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें चीन, सोवियत संघ, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्रसंघ के गठन का प्रारूप प्रस्तुत किया गया ।

 

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(5) याल्टा सम्मेलन

इस सम्मेलन ( 1945 ) में रुजवेल, चर्चिल और स्टालिन की सहमति से निश्चित किया गया कि ड़म्बरटन ओक्स के प्रस्ताव पर आधारित संयुक्त राष्ट्रसंघ के संविधान पर विचार करने के लिये सैन फ्रांसिस्को में बड़े पैमाने पर एक आम सम्मेलन बुलाया जाये।

 

(6) सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन

1945 में 25 अप्रैल से 26 जून तक सैन फ्रांसिस्को में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें 50 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पूर्व में चार राष्ट्रों-चीन, सोवियत संघ, ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधियों ने जो प्रारूप प्रस्तुत किया था, उसके आधार पर ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर का निर्माण किया गया। 26 जून, 1945 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर पचास राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये। बाद में एक और राष्ट्र पोलैण्ड ने हस्ताक्षर किया। इस प्रकार कुल 51 राष्ट्र संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रारम्भिक सदस्य हुए। 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक रूप से स्थापना हुई तथा भारत ने 30 अक्टूबर 1945 को इसकी सदस्यता ग्रहण की, जबकि उसके चार्टर को चीन, फ्रांस, सोवियत संघ, ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका एवं अन्य हस्ताक्षरकारी राष्ट्रों के बहुमत ने पुष्टि की। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में 111 अनुच्छेद है तथा यह 19 अध्याय में विभाजित है। वर्तमान में इसकी सदस्य संख्या193 है।

 

संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य

संक्षेप में, चार्टर के प्रथम अनुच्छेद के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के चार प्रमुख उद्देश्य हैं:

(1) सामूहिक व्यवस्था द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना और आक्रामक प्रवृत्तियों को नियन्त्रण में रखना।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान करना।

(5) राष्ट्रों के आत्मनिर्णय और उपनिवेशवाद विघटन की प्रक्रिया को गति देना।

(4) सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित एवं पुष्ट करना।

संघ ने इन उद्देश्यों से जुड़े हुए दो और लक्ष्य भी निर्धारित किये हैं। वे हैं- “नि:शस्त्रीकरण और नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना।

 

संयुक्त राष्ट्र संघ का सिद्धान्त

संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर के दूसरे अनुच्छेद में इसके निम्नलिखित मौलिक सिद्धान्त बताये गये हैं:

(1) इसका मुख्य आधार छोटे-बड़े सब देशों की समानता और सर्वोच्च सत्ता का सिद्धान्त है। उदाहरणार्थ, इसमें रूस और संयुक्त राज्य अमरीका जैसे बड़े राज्यों का तथा जिम्बाब्वे जैसे हाल में स्वतन्त्र हुए राज्यों का दर्जा समान माना है, उन्हें बराबर संख्या में प्रतिनिधि भेजने, इसकी सब कार्यवाहियों में भाग लेने, बोट देने के अधिकार एक जैसे हैं।

(2) सब सदस्यों से यह आशा रखी जाती है कि वे चार्टर द्वारा उन पर लागू होने वाले दायित्वों का पालन पूरी ईमानदारी से करेंगे।

(3) सभी सदस्य अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का निटपारा शान्तिपूर्ण साधनों से करेंगे।

(4) सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों के प्रतिकूल कोई कार्य नहीं करेंगे, वे किसी देश को स्वतन्त्रता का हनन करने की या आक्रमण करने की न तो धमकी देंगे और न ऐसा कार्य करेंगे।

(5) कोई भी देश चार्टर के प्रतिकूल काम करने वाले देश की सहायता नहीं करेगा।

(6) संयुक्त राष्ट्र संघ सदस्य न बनने वाले राज्यों से भी अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाये रखने वाले सिद्धान्तों का पालन करायेगा।

(7) संयुक्त राष्ट्र संघ किसी देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

 

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संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता

संयुक्त राष्ट्र चार्टर मे दो प्रकार की सदस्यता का उल्लेख है। प्रथम, कुछ देश तो प्रारम्भिक सदस्य हैं जिन्होंने 1 जनवरी, 1942 को संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये. थे, या सेनफ्रांसिस्को में चार्टर पर हस्ताक्षर करके उसकी पुष्टि की थी। द्वितीय, संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता उन सभी राष्ट्रों को भी उपलब्ध हो सकती है जो शान्तिप्रिय हों एवं चार्टर में विश्वास रखते हों। महासभा के दो-तिहाई बहुमत और सुरक्षा परिषद् के 15 सदस्यों में से 9 सदस्यों की स्वीकृति से जिसमें 5 स्थायी सदस्य अवश्य हों, उक्त शर्त के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्राप्त होती है। सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर ही महासभा किसी राज्य को सदस्यता प्रदान कर सकती है। इस पर सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (Veto) का अधिकार प्राप्त है।

सदस्यों का निलम्बन (Suspension of Members) – सुरक्षा परिषद् की रिपोर्ट पर सदस्य देश को महासभा से निलम्बित भी किया जा सकता है। चार्टर में सदस्यता समाप्त करने के सम्बन्ध में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। चार्टर की धारा 5 एवं 6 के अनुसार संघ के किसी भी सदस्य को, चार्टर के सिद्धान्तों का निरन्तर उल्लंघन करने पर सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर महासभा द्वारा सदस्यता से वंचित किया जा सकता है एवं उसकी सुविधाओं पर बन्धन भी लगाया जा सकता है। सुरक्षा परिषद् को किसी भी निलम्बित राष्ट्र को पुनः स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है।

सदस्यता का प्रत्याहरण (Withdrawal of Membership ) – संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता के प्रत्याहार के सम्बन्ध में चार्टर मौन है। यह सदस्यों की सदस्यता के प्रत्याहार करने की न तो आज्ञा देती है और न मना ही करता है। सेनफ्रांसिस्को सम्मेलन में इस विषय पर बड़ी बहस हुई थी। कुछ राज्य इस पक्ष में थे कि सदस्यों की सदस्यता की वापसी के लिए निषेध कर लिया जाये। कुछ अन्य राज्य इस पक्ष में थे कि यदि सदस्यों के लिए चार्टर में किये गये संशोधनों को स्वीकार करना असम्भव हो जाता है तो ऐसे सदस्यों को अपनी सदस्यता वापस लेने का अधिकार होना चाहिए। अन्त में यह निश्चित किया गया कि इस विषय में कोई व्यक्त प्रावधान न रखे जायें जिसके अनुसार विशेष परिस्थितियों में सदस्य अपनी सदस्यता ले सकते हैं। फेनविक के अनुसार चार्टर के अन्तर्गत भी सदस्य अपनी सदस्यता को निम्नलिखित दो परिस्थितियों में वापस ले सकते हैं:

1. सदस्य अपनी सदस्यता वापस ले सकते हैं यदि यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्था शान्ति बनाये रखने में असमर्थ है अथवा वे ऐसा केवल विधि तथा न्याय की कीमत पर कर सकते हैं।

2. यदि चार्टर के किसी संशोधन पर किसी राज्य ने सहमति प्रदान नहीं की और इसे स्वीकार करने में अपने को असमर्थ पाता है तो ऐसी परिस्थिति में ऐसे सदस्य को अपनी सदस्यता वापस लेने का अधिकार है।

अब तक केवल इण्डोनेशिया ने सन् 1965 में संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता का प्रत्याहार किया था, परन्तु एक वर्ष बाद इण्डोनेशिया पुनः संयुक्त राष्ट्र संघ में लौट आया।

सदस्यों का निष्कासन ( Expulsion of Membership ) – चार्टर के अनुच्छेद 6 के अनुसार, यदि कोई सदस्य जानबूझकर तथा लगातार चार्टर में वर्णित सिद्धान्तों का उल्लंघन करता है तो उसे सुरक्षा परिषद् के सुझाव पर महासभा द्वारा संस्था से निकाला जा सकता है। चूंकि सदस्यों का निष्कासन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, इसके लिए सुरक्षा परिषद् के 9 सदस्यों को सकारात्मक सहमति (जिसमें पाँचों स्थायी सदस्य भी शामिल होने चाहिए ) तथा महासभा का निर्णय दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से होना चाहिए।

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