सामाजिक समझौते का सिद्धांत

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( criticism of social contract ) सामाजिक समझौता सिद्धांत की आलोचना

17वीं 18वीं सदी में समझौता सिद्धांत अत्यंत लोकप्रिय रहा, परंतु 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के राजनीतिक विचारकों ने इस सिद्धांत की कड़ी आलोचना प्रस्तुत की।

(1) समझौता अनैतिहासिक ऐतिहासिक दृष्टि से सामाजिक समझौता सिद्धांत एक गलत मात्र है क्योंकि इतिहास में इस बात का कहीं भी उदाहरण नहीं मिलता कि आदिम मनुष्य ने पारस्परिक समझौते के आधार पर राज्य की स्थापना की हो। संविदा सिद्धांत के समर्थक अपने पक्ष में 11नवंबर,1620 के ‘मैफ्लाइवर एक्ट'(mayflower pact) का उदाहरण देते हैं, जिनमें मैफ्लाइवर नामक जहाज पर बैठे हुए इंग्लैंड से अमेरिका जाने वाले अंग्रेजों ने अनुबंध किया था कि “हम लोग शांति और सुख का जीवन व्यतीत करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक समाज की रचना करेंगे।” किंतु इस उदाहरण से समझौता सिद्धांत की पुष्टि नहीं होती, क्योंकि समझौता सिद्धांत में वर्णित प्राकृतिक अवस्था के लोगों और मैफ्लावर पैक्ट से संबंधित लोगों की राजनीतिक चेतना में बहुत अधिक अंतर है। मैफ्लावर पैक्ट से

(2) प्राकृतिक अवस्था की धारणा गलत सामाजिक समझौता सिद्धांत मानवीय इतिहास को प्राकृतिक अवस्था और सामाजिक अवस्था इस प्रकार के दो भागों में बांट देता है और एक ऐसी अवस्था की कल्पना करता है, जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार का समाज और राज्य नहीं था, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह काल विभाजन नितांत असत्य है। इतिहास में कहीं पर भी हमें ऐसी अवस्था का प्रमाण नहीं मिलता, जब मानव संगठन विहीन अवस्था में रहता हो।

(3) राज्य विकास का परिणाम है निर्माण का नहीं इतिहास के अनुसार राज्य और इसी प्रकार की अन्य मानवी संस्थाओं का विकास हुआ है, निर्माण नहीं। स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य आरंभ में परिवारों में, फिर कुलों, फिर कबीलों और फिर जनपदों अथवा राज्य में संगठित हुआ। अतः समझौता सिद्धांत की इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि राज्य का किसी एक विशेष समय पर निर्माण किया गया।

(4) राज्य की सदस्यता ऐच्छिक नहीं इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य को एक ऐसे संगठन के रूप में चित्रित किया गया है जिसकी सदस्यता ऐच्छिक हो, किंतु राज्य की सदस्यता ऐच्छिक नहीं वरन् अनिवार्य होती है, और व्यक्ति उसी प्रकार राज्य के सदस्य होते हैं, जिस प्रकार परिवार के। यदि राज्य एक क्लब या व्यापारिक संस्था की तरह स्वेच्छा से बनाया गया संगठन होता तो व्यक्ति को यह स्वतंत्रता होती कि वह जब चाहे तब उसमें शामिल हो जाए और जब चाहे तब उससे अलग हो जाए। क्योंकि इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य को साधारण साझेदारी पर आधारित आर्थिक समुदाय के रूप में चित्रित किया गया है, अतः इस सिद्धांत द्वारा किया गया राज्य के स्वरूप का प्रतिपादन पूर्णतः गलत है।

(5) प्राकृतिक अवस्था में अधिकारों का अस्तित्व संभव नहीं इस सिद्धांत के समर्थकों का प्रमुख रूप से लाॅक का विचार है कि व्यक्ति प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक अधिकारों का उपयोग करते थे परंतु प्राकृतिक अधिकारों और प्राकृतिक स्वतंत्रता की धारणा नितांत भ्रमपूर्ण है। अधिकारों का उदय समाज में ही होता है, और एक राज्य के अंतर्गत रहकर ही अधिकारों का उपयोग किया जा सकता है।

(6) प्राकृतिक अवस्था में समझौता संभव नहीं यदि तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि आदिम मनुष्य अपनी सामाजिक चेतना में इतना आगे बढ़ चुका था कि वह समझौता कर सके, तो प्राकृतिक अवस्था में किए गए किसी भी समझौते का वैज्ञानिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं है क्योंकि किसी समझौते को वैद्य रूप प्राप्त होने के लिए यह आवश्यक है कि उसके पीछे राज्य की स्वीकृति का बल हो, लेकिन प्राकृतिक अवस्था में राज्य का अस्तित्व ना होने के कारण सामाजिक समझौते के पीछे इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं थी।

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