राज्य और उसके तत्व

 

राज्य और उसके तत्व( state and its element)

  • राज्य का अर्थ एवं परिभाषा
  • मध्ययुगीन परिभाषाएं
  • राज्य के तत्व

 

राज्य का अर्थ एवं परिभाषा (meaning and definition)

प्राचीन विचारकों के अनुसार प्राचीन विचारक राज्य के 2 लक्षण मानते हैं। प्रथम राज्य व्यक्तियों का एक समुदाय है और द्वितीय राज्य व्यक्तियों के शुभ और लाभ के लिए निर्मित एक श्रेष्ठ समुदाय है। इसी विचारधारा के आधार पर अरस्तु और इसरो ने राज्य की परिभाषा इस प्रकार की है:
अरस्तु के अनुसार “राज्य परिवारों और ग्रामों का एक समुदाय है इसका उद्देश्य पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है।”
इसी प्रकार से शुरू के शब्दों में ” राज्य उस समुदाय को कहते हैं जिसमें यह भावना विद्यमान हो कि सब मनुष्य को उस समुदाय के लाभों को परस्पर साथ मिलकर उपभोग करना है।”

मध्ययुगीन परिभाषाएं प्राचीन विचारको द्वारा राज्य को एक समुदाय कहा गया है लेकिन आधुनिक विचारको के अनुसार केवल व्यक्तियों से ही राज्य का निर्माण नहीं हो जाता है, राज्य का रूप प्राप्त करने के लिए व्यक्ति एक निश्चित क्षेत्र पर भली प्रकार बसे हुए होने चाहिए और इनमें शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई राजनीतिक सत्ता होनी चाहिए।

वुडरो विल्सन “किसी निश्चित प्रदेश के भीतर कानून के लिए संगठित जनता को राज्य कहते हैं।”

ब्लंशली “किसी निश्चित भू प्रदेश में राजनीतिक दृष्टि से संगठित व्यक्तियों को राज्य कहा जाता है।”

थोड़े समय बाद यह समझा गया कि इस प्रकार के संगठन को भी उस समय तक राज्य नहीं कहा जा सकता है जब तक इस संगठन के पास संप्रभुता या सर्वोच्च शक्ति ना हो। इस प्रकार राज्य के आवश्यक तत्वों में संप्रभुता को सम्मिलित किया गया और इस बात को दृष्टि में रखते हुए लास्की ने राज्य की परिभाषा करते हुए कहा है कि “राज्य एक ऐसा प्रादेशिक समाज है जो सरकार और प्रजा में विभाजित है और जो अपने निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में सभी समुदायों पर सर्वोच्च सत्ता रखता है।”
किंतु प्रोफेसर लास्की द्वारा दी गई राज्य की परिभाषा को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसका कारण यह है कि संप्रभुता के जो दो पक्ष होते हैं – आंतरिक पक्ष और विपक्ष, उनमें लास्की के द्वारा संप्रभुता के केवल आंतरिक पक्ष का ही विवेचन किया गया है बाहरी पक्ष का नहीं।

वस्तुतः अब तक राज्य की जो परिभाषाएं की गई हैं उनमें फिल्म मोर और गवर्नर की परिभाषाएं ही सबसे अधिक मान्य है। यह परिभाषाएं इस प्रकार हैं-
फिल्मोर के शब्दों में, “राज्य मनुष्यों का वह समुदाय है जो एक निश्चित भूभाग पर स्थाई रूप से बसा हुआ हो और जो एक सुव्यवस्थित सरकार द्वारा उस भूभाग की सीमा के अंतर्गत व्यक्तियों तथा पदार्थों पर पूरा नियंत्रण तथा प्रभुत्व रखता हो और जिसे विश्व के अन्य किसी भी राज्य से संधि या युद्ध करने अथवा अन्य किसी प्रकार से अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने का अधिकार प्राप्त हो।”

फिल्मोर की इस परिभाषा में राज्य के सभी तत्वों जनसंख्या, निश्चित भूभाग , सरकार और आंतरिक तथा बाहरी संप्रभुता का उल्लेख हो गया है।

इसी प्रकार गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक कानून की धारा के रूप में, राज्य संख्या में कम या अधिक व्यक्तियों का ऐसा संगठन है जो किसी प्रदेश के निश्चित भूभाग में स्थाई रूप से रहता हो, जो बाहरी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्र या लगभग स्वतंत्र हो और जिसका एक ऐसा संगठित शासन हो जिस के आदेश का पालन नागरिकों का विशाल समुदाय स्वभावि रूप से करता हो।”

गार्नर कि इस परिभाषा में भी राज्य के चारों तत्वों जनसंख्या भूमि शासन एवं संप्रभुता का उल्लेख होता है।

 

राज्य के तत्व(elements of state)

इन तमाम परिभाषाओं के आधार पर राज्य के आवश्यक तत्वों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-

1. जनसंख्या(population) – मानव के सामाजिकता के गुण के आधार पर राज्य का जन्म हुआ और व्यक्तियों से मिलकर ही राज्य का निर्माण होता है। अतः सभी विद्वान जनसंख्या को राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन एक राज्य के अंतर्गत कितनी जनसंख्या होनी चाहिए इस संबंध में विद्वानों के विचारों में पर्याप्त मतभेद हैं और अपनी कल्पना की आदर्श शासन व्यवस्था तथा राज्य की शक्ति के संबंध में अपने विचारों के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं। प्लेटो , अरस्तु , रूसो आदि विद्वान प्रत्यक्ष प्रजातंत्र शासन को श्रेष्ठ समझते थे और क्यों कि प्रजातंत्र के इस रूप को थोड़ी जनसंख्या वाले राज्य में ही अपनाया जा सकता है, अतः प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में आदर्श राज्य का चित्रण करते हुए कहा है कि एक आदर्श राज्य में 5040 नागरिक होने चाहिए। इसी प्रकार अरस्तु के अनुसार राज्य की जनसंख्या लगभग 10,000 होनी चाहिए। दूसरी ओर हिटलर मुसोलिनी तथा अन्य अनेक व्यक्तियों का विचार है कि राज्य एक शक्ति है और यह शक्ति ठीक प्रकार से कार्य कर सकें इसके लिए यह आवश्यक है कि इसमें अधिकतम जनसंख्या हो।

2.- निश्चित क्षेत्र या भूभाग(territory) डिग्विट और शीले, आदि कुछ विद्वानों ने तो निश्चित क्षेत्र को राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार नहीं किया है, किंतु एक निश्चित क्षेत्र के अभाव में व्यक्तियों द्वारा व्यवस्थित जीवन व्यतीत नहीं किया जा सकता है , इसलिए वर्तमान समय में सभी विद्वान निश्चित क्षेत्र को राज्य के एक आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार करते हैं।
ब्लंसली के शब्दों में कहा गया है कि “जैसे राज्य का व्यक्तिक आधार जनता है, उसी प्रकार उसका भौतिक आधार प्रदेश है। जनता उस समय तक राज्य का रूप धारण नहीं कर सकती जब तक उसका कोई निश्चित प्रदेश न हो।”

इस संबंध में यह स्मरणीय है कि राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में भूमि का अभिप्राय केवल क्षेत्र से ही नहीं है अपितु इसके अंतर्गत वे सभी प्राकृतिक साधन भी सम्मिलित होते हैं जो किसी देश को स्थल , जल और वायु में प्राप्त हो अर्थात् किसी राज्य में विद्यमान नदियां , सरोवर झीलें ,खनिज पदार्थ राज्य से 12 मील तक का समुद्र और वायुमंडल सभी भूमि के अंतर्गत आते हैं।

3.- सरकार(government) मानव समूह एक निश्चित क्षेत्र में जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठित होता है, वह उद्देश्य उस समय तक पूर्ण नहीं हो सकता , जब तक इन व्यक्तियों का जीवन कुछ नियमों द्वारा नियमित ना हो और सरकार ही वह संस्था या साधन है जो उक्त उद्देश्यों को पूर्ण कर सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार ही राज्य में बसे हुए जन समुदाय की इच्छा को कार्य रूप में परिवर्तित कर सकती है। सरकार के अभाव में सभी लोग अपने-अपने हितों की भाषा में अलग-अलग स्वर से बोलेंगे और कोई भी निश्चित मत पर नहीं पहुंच सकेगा। इस प्रकार सरकार राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है।

सरकार का कोई ऐसा निश्चित रूप नहीं है जो सभी राज्यों को मान्य हो। सरकार राज तंत्र आत्मक कुलीन तंत्र आत्मक या प्रजातंत्र आत्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है यद्यपि वर्तमान समय में प्रजातंत्रात्मक सरकार दूसरे प्रकार की सरकारों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय है।

4.- संप्रभुता(sovereignity) एक निश्चित क्षेत्र में रहने वाले तथा सरकार से संपन्न लोग भी उस समय तक राज्य का निर्माण नहीं कर सकते जब तक कि इनके हाथ में संप्रभुता न हो। उदाहरण , 15 अगस्त 1947 के पूर्व भारत की अपनी जनसंख्या , क्षेत्र और सरकार थी किंतु भारत राष्ट्र प्रभुसत्ता संपन्न न होने के कारण राज्य नहीं था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को संप्रभुता प्राप्त हुई और तभी भारत एक स्वतंत्र राज्य हुआ।

राज्य की संप्रभुता से तात्पर्य है कि राज्य आंतरिक रुप से उत्तम हो अर्थात अपने क्षेत्र में स्थित सभी व्यक्तियों और समुदायों को आज्ञा प्रदान कर सके और वह बाहरी नियंत्रण से मुक्त हो, अर्थात दूसरे राज्यों के साथ अपनी इच्छा अनुसार संबंध स्थापित कर सके , किंतु यदि कोई राज्य स्वेच्छा से अपने ऊपर किसी प्रकार का प्रतिबंध स्वीकार कर लेता है , तो इससे राज्य की संप्रभुता समाप्त नहीं हो जाती है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यता से विभिन्न राज्यों की संप्रभुता सीमित नहीं हुई है।

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