Directive principles of the state policy-राज्य के नीति निर्देशक तत्व

 

राज्य के नीति निर्देशक तत्व (directive pricnciples of the state policy) 

               CONTENT :

  1. परिचय
  2. नीति निदेशक तत्वों का अर्थ एवं स्वरूप
  3. संविधान में वर्णित नीति निदेशक तत्व
  4. नीति निदेशक तत्व की आलोचना


परिचय
नीति निदेशक तत्वों की व्यवस्था हमारे संविधान की प्रमुख विशेषता है। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने नागरिकों की सार्वभौमिक विकास के लिए अधिकारों की एक विस्तृत व्यवस्था का निर्माण किया। इसी के साथ उन्होंने भावी भारत की सरकारों के कार्यक्रमों की एक रूपरेखा प्रस्तुत की जिन्हें अपनाकर भारत के लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के सपने को साकार किया जा सके।

 

नीति निदेशक तत्वों का अर्थ एवं स्वरूप –

भारतीय संविधान के भाग 4 (अनुच्छेद 36- 51) में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का वर्णन किया गया है, जिनके संदर्भ में संविधान निर्माताओं का यह विश्वास था कि वह भारत की भावी सरकारों द्वारा नीतियों के निर्धारण में दिशा निर्देश का कार्य कर सकते हैं। इन सिद्धांतों का कोई वैधानिक आधार नहीं है और न ही यह कोई वैधानिक उपचार देते हैं। इसके बावजूद राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों ने दीपस्तंभ का कार्य किया। संविधान निर्माताओं का मानना था कि मौलिक अधिकारों के द्वारा राजनीतिक लोकतंत्र की आधारशिला रखना तभी सार्थक होगा जब उसके साथ में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना की जाए। इस उद्देश्य से उन्होंने नीति निदेशक सिद्धांतों के रूप में ऐसे सिद्धांतों की रचना की जिनको क्रियात्मक रूप देकर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की जा सके।

डॉ राजेंद्र प्रसाद के अनुसार –
“राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का उद्देश्य जनता के कल्याण को प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है।”
इन तत्वों के स्वरूप के संबंध में संविधान के 37वें अनुच्छेद में कहा गया है “इस भाग में दिए गए उपबंधों को किसी भी न्यायालय द्वारा मान्यता नहीं दी जा सकेगी, किंतु फिर भी इसमें दिए हुए तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और शासन के संचालन में इन तत्वों का प्रयोग करना उसका कर्तव्य होगा।

 

संविधान में वर्णित नीति निदेशक तत्व

संविधान में नीति निर्देशक तत्व का कोई वर्गीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया है। प्रो. एम.पी. शर्मा ने अपनी पुस्तक “द कांस्टीट्यूशन आफ इंडियन रिपब्लिक” में इन्हें तीन भागों में वर्गीकृत किया है जो इस प्रकार हैं –

(1) समाजवादी तत्व ये वे तत्व हैं जिनका उद्देश्य भारत में सामाजिक न्याय पर आधारित समाज के समतावादी विद्यालय की स्थापना करना है जो इस प्रकार हैं –
1. राज्य अपने आर्थिक साधनों के अनुसार और विकास की सीमाओं के भीतर यह प्रयास करेगा कि सभी नागरिक अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार पा सके। (अनुच्छेद 39-ए)
2. राज्य इस बात का ध्यान रखेगा कि संपत्ति और उत्पादन के साधनों का इस प्रकार से केंद्रीकरण न हो कि सार्वजनिक हित को किसी प्रकार की हानि पहुंचे। (अनुच्छेद 39-बी)
3. राज्य देश के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था करेगा कि अधिक से अधिक लोगों का सार्वजनिक हित हो सके। (अनुच्छेद 39-सी)
4. राज्य प्रत्येक स्त्री और पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करेगा। (अनुच्छेद 39-डी)
5. राज्य महिलाओं, पुरुषों एवं बच्चों के लिए स्वास्थ्य का समुचित प्रबंध करेगा। बच्चों को आर्थिक आवश्यकताओं के चलते कोई ऐसा कार्य न करना पड़े जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो। (अनुच्छेद 39- ई)
6. राज्य अपने साधनों के अनुरूप यह सुनिश्चित करेगा कि बेरोजगारी, वृद्धावस्था, अंगहीनता आदि स्थितियों में सार्वजनिक सहायता दी जा सके। (अनुच्छेद 41)
7. राज्य इस बात का प्रयास करेगा कि कृषि और उद्योग में लगे हुए सभी मजदूरों को अपने जीवन निर्वाह हेतु यथोचित पारिश्रमिक मिल सके, उनका जीवन स्तर उठ सके, वे अवकाश के समय का उचित उपयोग कर सकें तथा उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति का अवसर प्राप्त हो सके। (अनुच्छेद 43)

 

(2) उदारवादी तत्व – इस श्रेणी में उन तत्वों को शामिल किया गया है जिनका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा की रक्षा करना और उसे ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है जिसमें वह अपना विकास कर सके। इस श्रेणी से संबंधित मुख्य निदेशक तत्व निम्नलिखित है –
1. राज्य अपने सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता का निर्माण करेगा। (अनुच्छेद 44)
2. राज्य 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निशुल्क अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करेगा। (अनुच्छेद 45)
3. राज्य अपनी सेवाओं में कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य पृथक्करण का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 50)
4. राज्य आवश्यकतानुसार निशुल्क वैधानिक सहायता उपलब्ध कराएगा। (अनुच्छेद 39-ए)
5. राज्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंध में कर्मचारियों को भागीदारी प्रदान करने के लिए समुचित कदम उठाएगा। (अनुच्छेद 43- ए)
6. रांची ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की रक्षा करेगा। (अनुच्छेद 49)
7. राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, राष्ट्रों के मध्य सम्मानपूर्ण संबंधों की स्थापना तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की दिशा में प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 51)
8. राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित कराने एवं प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा। (अनुच्छेद 42)

 

(3) गांधीवादी तत्व इस श्रेणी में वह तत्व आते हैं, जो गांधीवादी दर्शन से प्रभावित हैं।
1. राज्य स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में ग्राम पंचायतों का गठन करेगा। (अनुच्छेद 40)
2. राज्य कमजोर वर्गों विशेषकर अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्यों की आर्थिक एवं शैक्षणिक हितों के पोषण का प्रयत्न करेगा। (अनुच्छेद 46)
3. राज्य औषधि के उद्देश्य से प्रयोग को छोड़कर मादक द्रव्य तथा मादक पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगायेगा। (अनुच्छेद 47)
4. राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों की स्थापना का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 43)
5. राज्य गाय, भैंस आदि दुधारू पशुओं के वध रोकने हेतु विधि निर्माण करेगा। (अनुच्छेद 48)

 

नीति निदेशक तत्व की आलोचना

संविधान निर्माण के समय से ही निदेशक तत्व आलोचना के विषय रहे हैं। उनके संबंध में पहली आलोचना यह है कि यह केवल पवित्र घोषणाएं हैं। उससे अधिक कुछ नहीं क्योंकि इन्हें कानून द्वारा नहीं मनवाया जा सकता। प्रो. के. पी. शाह ने संविधान सभा में कहा था कि “यह ऐसा चेक है जिसका भुगतान बैंक की इच्छा पर निर्भर है।” दूसरी आलोचना यह है कि इन तत्वों में अधिकतर ऐसी बातें हैं जो काल्पनिक है। तीसरी आलोचना यह है कि यह अस्पष्ट है।

उपयुक्त आलोचनाओं के बावजूद इनका विशेष महत्व है। क्योंकि यह संविधान में उल्लिखित हैं इसलिए ये सबको सरकार के कर्तव्य की याद दिलाते हैं। यदि कोई सरकार इनकी उपेक्षा करती है तो विरोधी दल इनके आधार पर सरकार की आलोचना कर सरकार को इनके अनुसार कार्य करने को बाध्य कर सकता है। इनमें से कतिपय तत्वों के आधार पर विधि निर्माण भी हुआ है।

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